
पटना। देश को ‘संपूर्ण क्रांति’ का मंत्र देने वाले लोकनायक जयप्रकाश नारायण की 11 अक्तूबर को 124वीं जयंती है। पूरा देश उन्हें श्रद्धा से याद कर रहा है। लेकिन यह बड़ी विडंबना है कि जिस शख्सियत ने समाज की दिशा बदलने के लिए अपना जीवन समर्पित किया, उनकी जन्मभूमि सिताब दियारा आज भी कई मोर्चों पर उपेक्षा का शिकार है। जिस धरती ने लोकतंत्र का प्रहरी दिया, वहां बुनियादी विकास के सवाल आज भी ज्यों के त्यों खड़े हैं।गंगा और घाघरा नदियों के संगम के बीच बसे सिताब दियारा का इतिहास, जेपी के जीवन की तरह ही संघर्षों से जुड़ा है। यहां की भौगोलिक परिस्थितियां हमेशा से चुनौतीपूर्ण रही हैं। भीषण बाढ़ और नदियों के कटाव ने यहां के जनजीवन को गहरे तक प्रभावित किया है। बचपन में गांव में प्लेग फैलने और नदी के विकट कटाव के कारण ही जेपी के परिवार को उत्तर प्रदेश की ओर प्रस्थान करना पड़ा था। आज उत्तर प्रदेश का जयप्रकाश नगर और बिहार का सिताब दियारा, दोनों ही क्षेत्र उनकी अमिट स्मृतियों के प्रतीक हैं, लेकिन दोनों जगहें विकास की उस मुकम्मल रोशनी से दूर हैं, जिसका सपना लोकनायक ने देखा था।
सियासी मंचों पर गूंजता है जेपी का नाम
विकास के मोर्चे पर बात करें, तो समय के साथ सड़क, बिजली, पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार हुआ है। सरकारों ने प्रयास भी किए हैं, लेकिन आज भी सिताब दियारा के लोगों के सामने बाढ़ और नदी के कटाव से स्थायी सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा है। क्षेत्र में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर और एक मजबूत-स्थायी आधारभूत संरचना का निर्माण होना अभी भी बाकी है।जेपी का नाम आज भी देश की सियासत में बड़े सम्मान के साथ लिया जाता है। उनके आंदोलन से निकले नेता आज सत्ता के शीर्ष पर काबिज हैं। विभिन्न राजनीतिक दल अपने-अपने हिसाब से उनकी विचारधारा को भुनाते हैं। हालांकि, जेपी की असली विरासत का मूल्यांकन मंचों से लगने वाले नारों से नहीं हो सकता। इसकी वास्तविक कसौटी यह है कि उनके विचारों की दुहाई देने वाले लोग, लोकतांत्रिक मूल्यों, सार्वजनिक जवाबदेही, सामाजिक समानता और जनकल्याण के प्रति असल में कितने समर्पित हैं।
नारों में लोकनायक, हकीकत में बदहाल सिताब दियारा
आठ अक्तूबर 1979 को जेपी का निधन हुआ था, लेकिन उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। उन्होंने सिखाया कि लोकतंत्र केवल सरकारों से नहीं, बल्कि जागरूक नागरिकों और अन्याय के खिलाफ खड़े होने के साहस से मजबूत होता है। 124वीं जयंती पर जन्मभूमि सिताब दियारा से यह सवाल उठता है कि क्या हम केवल तस्वीरों पर माल्यार्पण करेंगे? जेपी को सच्ची श्रद्धांजलि तभी मिलेगी, जब ‘संपूर्ण क्रांति’ का संदेश सियासी भाषणों से निकलकर शासन, समाज और आम नागरिक के जीवन में उतरे।



