
पटना। हाईकोर्ट ने न्याय प्रणाली में एक अहम नजीर पेश करते हुए भागलपुर के 2006 के चर्चित गोलीकांड में निचली अदालत के बरी करने वाले फैसले को पलट दिया है। अदालत ने मामले के सभी अभियुक्तों को दोषी करार देते हुए मुख्य आरोपी शमशेर उर्फ सम्सुल मिस्त्री को सात वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है। जस्टिस विवेक चौधरी और जस्टिस राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि ट्रायल कोर्ट ने घायल प्रत्यक्षदर्शी की विश्वसनीय गवाही और चिकित्सीय साक्ष्यों का समुचित मूल्यांकन नहीं किया था, जिसके चलते अभियुक्तों को अनुचित रूप से संदेह का लाभ मिल गया।यह पूरा मामला 18 नवंबर 2006 का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, भागलपुर के जगदीशपुर थाना क्षेत्र स्थित खिरीबांध गांव में एक मजार की भूमि पर विद्यालय निर्माण को लेकर दो पक्षों के बीच विवाद उत्पन्न हो गया था।

इसी दौरान अभियुक्त चांद आलम उर्फ मनु ने पीड़ित सम्स तबरेज को पकड़कर जमीन पर गिरा दिया और शमशेर उर्फ सम्सुल मिस्त्री को गोली चलाने का निर्देश दिया। शमशेर द्वारा चलाई गई गोली सम्स तबरेज की पीठ में लगी, जिससे वह गंभीर रूप से घायल हो गए। घटना के बाद जगदीशपुर थाने में कांड संख्या-274/2006 दर्ज किया गया था।भागलपुर के सत्र न्यायालय ने 11 जनवरी 2018 को सभी अभियुक्तों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था। इस फैसले के खिलाफ पीड़ित पक्ष ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने कहा कि कानून में घायल प्रत्यक्षदर्शी की गवाही का विशेष महत्व होता है। कोर्ट ने पाया कि घायल सम्स तबरेज की गवाही एफआईआर से लेकर पूरे मुकदमे के दौरान एक समान रही और डॉक्टर की रिपोर्ट से भी निकट से गोली चलने की पुष्टि हुई।हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पुलिस विवेचना में हथियार या गोली की बरामदगी नहीं होना या कुछ अधिकारियों का गवाही के लिए उपस्थित न होना, अपने आप में अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करता है।
केवल रिश्तेदारी या गवाहों के बयानों में मामूली विरोधाभास के आधार पर अहम साक्ष्यों को खारिज नहीं किया जा सकता।अदालत ने साक्ष्यों के आधार पर मुख्य आरोपी शमशेर उर्फ सम्सुल मिस्त्री को आईपीसी की धारा 307 एवं शस्त्र अधिनियम की धारा 27 सहित अन्य धाराओं में दोषी ठहराते हुए सात वर्ष के सश्रम कारावास और ₹25,000 जुर्माने की सजा सुनाई है।वहीं, चांद आलम उर्फ मनु समेत अन्य अभियुक्तों को धारा 307/149, 324/149 तथा 147/148 (आईपीसी) के तहत दोषी ठहराते हुए पांच वर्ष तक के सश्रम कारावास और ₹15,000-₹15,000 के जुर्माने की सजा दी गई है। हाईकोर्ट ने सभी दोषियों को चार सप्ताह के भीतर ट्रायल कोर्ट में सरेंडर करने का सख्त निर्देश दिया है। ऐसा न करने पर उनकी गिरफ्तारी का आदेश जारी किया जाएगा।



