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उप-वर्गीकरण से आरक्षण समाप्त होने का भ्रम बेबुनियाद: डॉ. संतोष कुमार सुमन

आरक्षण में हिस्सेदारी पर घमासान: संतोष सुमन ने पूछा— जब दूसरे राज्यों में उप-वर्गीकरण संभव, तो बिहार में विरोध क्यों?

पटना। अनुसूचित जाति के भीतर उप-वर्गीकरण यानी कोटे में कोटा लागू करने की मांग को लेकर बिहार का सियासी पारा चढ़ गया है। हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार सरकार के मंत्री डॉ. संतोष कुमार सुमन ने इस व्यवस्था का विरोध करने वाले सियासी दलों को आड़े हाथों लिया है। उन्होंने विरोधियों पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि कुछ दल दलित और महादलित समाज को आरक्षण खत्म होने का डर दिखाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेक रहे हैं। उन्होंने दो टूक शब्दों में स्पष्ट किया कि यह मांग आरक्षण समाप्त करने की नहीं, बल्कि समाज के अंतिम पायदान पर खड़े सबसे वंचित व्यक्ति तक उसका वाजिब हक पहुंचाने की संवैधानिक पहल है।सुमन ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने भी ठोस और अनुभवजन्य आंकड़ों के आधार पर उप-वर्गीकरण को कानूनी रूप से वैध ठहराया है। इसके बावजूद बिहार में भ्रम का माहौल पैदा किया जा रहा है। उन्होंने विरोधियों को कटघरे में खड़ा करते हुए पूछा कि जब देश के दूसरे राज्यों में यह व्यवस्था सफलता से लागू हो सकती है, तो बिहार में ऐसा करने से आरक्षण कैसे खतरे में पड़ जाएगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि हरियाणा में अनुसूचित जाति के आरक्षण को दो हिस्सों में बांटा गया है, वहीं आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में इसे तीन समूहों में वर्गीकृत करके लागू किया गया है। तमिलनाडु में अरुंधतियार समाज के लिए आंतरिक आरक्षण दिया गया है और कर्नाटक ने भी इसके लिए कानून बनाया है। इन राज्यों में कुल आरक्षण समाप्त नहीं हुआ, बल्कि हिस्सेदारी को पहले से अधिक पारदर्शी और न्यायसंगत बनाया गया है।

अंतिम पायदान तक हक पहुंचाने की लड़ाई

मंत्री ने विरोधियों के सामने कई तीखे सवाल रखे। उन्होंने पूछा कि जब बिहार में अन्य पिछड़ा वर्ग को ओबीसी और ईबीसी में बांटकर न्याय दिया जा सकता है, तो फिर अनुसूचित जाति के भीतर असमानता की पहचान करने पर आपत्ति क्यों है। क्या विरोध करने वाले नेता इस बात के पक्ष में हैं कि सभी दलित जातियों के सामाजिक, आर्थिक और सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व के वास्तविक आंकड़े जनता के सामने आएं। उन्होंने चिंता जताई कि दशकों बाद भी समाज के कई वर्गों में साक्षरता दर बेहद कम है, ऐसे में विशेष नीतियों के बिना उन्हें मुख्यधारा में कैसे लाया जा सकता है।सुमन ने नारा देने वाले नेताओं को याद दिलाया कि जो लोग कभी आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी की बात करते थे, वे आज सबसे पिछड़े दलितों के हक पर चुप्पी क्यों साधे हैं। उन्होंने कहा कि राजनीति मसीहा बनने से नहीं, बल्कि कमजोरों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाने से चलेगी। आरक्षण का दायरा किसी से छीनना नहीं, बल्कि जिसे अब तक कुछ नहीं मिला, उसे आगे बढ़ाना ही असली सामाजिक न्याय है।

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