
पटना। बिहार के विश्वविद्यालयों में सहायक प्राध्यापक (असिस्टेंट प्रोफेसर) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर पटना हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। मुख्य न्यायाधीश वी. कामेश्वर राव और न्यायमूर्ति हरीश कुमार की खंडपीठ ने इस मामले में पूर्व में दिए गए एकलपीठ के 20 फरवरी, 2025 के आदेश को सिरे से रद्द कर दिया है। इसके साथ ही, न्यायालय ने सभी 26 रिट याचिकाओं को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस एकलपीठ के पास भेज दिया है।
प्राकृतिक न्याय का हुआ था उल्लंघन
यह पूरा मामला बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग (बीएसयूएससी) की कार्यप्रणाली से जुड़ा है। आयोग की ओर से एकलपीठ के फैसले के खिलाफ 26 अपीलें दाखिल की गई थीं। सुनवाई के दौरान आयोग का पक्ष रखते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता पीके शाही ने अदालत को बताया कि एकलपीठ ने आयोग को अपना पक्ष रखने और जवाबी हलफनामा दाखिल करने का पर्याप्त अवसर दिए बिना ही एकतरफा निर्देश जारी कर दिए थे। एकलपीठ ने प्रभावित अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में शामिल करने का आदेश दिया था। खंडपीठ ने आयोग की इस दलील को प्रक्रियात्मक रूप से वैध माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पक्ष को सुनवाई का पर्याप्त अवसर न देना ‘प्राकृतिक न्याय’ के स्थापित सिद्धांतों का गंभीर उल्लंघन है। इसी आधार पर पूर्व के आदेश को निरस्त किया गया। सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने सहायक प्राध्यापक नियुक्ति प्रक्रिया में हो रही अत्यधिक देरी पर गहरी चिंता व्यक्त की। अदालत ने संज्ञान लिया कि 21 सितंबर, 2020 को इन पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था। आज लगभग पांच वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन नियुक्ति प्रक्रिया अब तक पूरी नहीं हो सकी है। इस सरकारी लेट-लतीफी का खामियाजा उन युवाओं को भुगतना पड़ रहा है, जिनकी आयु सीमा समाप्त हो गई है या समाप्ति की कगार पर है। हाईकोर्ट ने इस स्थिति को संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 के आलोक में बेहद गंभीर माना। कोर्ट ने कहा कि रोजगार के अवसरों से इस तरह वंचित करना मौलिक अधिकारों पर प्रहार है।
आयोग की कार्यप्रणाली पर भी उठे सवाल
अदालत ने आयोग की प्रशासनिक कार्यशैली पर भी सवालिया निशान लगाए। कोर्ट ने कहा कि आयोग द्वारा विज्ञापन की शर्तों के अनुसार क्रीमी लेयर प्रमाणपत्र और अन्य आवश्यक दस्तावेजों की समय पर जांच नहीं की गई। इस प्रशासनिक चूक के कारण कई योग्य अभ्यर्थियों को साक्षात्कार में शामिल होने के अवसर से वंचित होना पड़ा। खंडपीठ ने मामले को फिर से एकलपीठ के पास भेजते हुए समय-सीमा भी तय कर दी है। बिहार राज्य विश्वविद्यालय सेवा आयोग को अपना विस्तृत जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया गया है। इसके बाद, संबंधित याचिकाकर्ताओं को अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने के लिए एक सप्ताह की मोहलत मिलेगी। अब इस मामले की सुनवाई निर्धारित रोस्टर के अनुसार होगी।
इतिहास व भूगोल के लिए विशेष निर्देश
न्यायालय ने यह साफ कर दिया है कि इतिहास और भूगोल विषयों में जिन अभ्यर्थियों का चयन सहायक प्राध्यापक के पद पर होगा, उन्हें जारी किए जाने वाले नियुक्ति पत्रों में एक विशेष शर्त का उल्लेख अनिवार्य रूप से करना होगा। नियुक्ति पत्र में यह स्पष्ट लिखना होगा कि उनकी यह नियुक्ति इन 26 रिट याचिकाओं के अंतिम परिणाम और अदालत के फैसले के पूर्णतः अधीन रहेगी। इस आदेश से विवाद का अभी अंतिम निपटारा नहीं हुआ है।



