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पटना हाईकोर्ट का अहम फैसला: आरटी-पीसीआर रिपोर्ट के अभाव में कोविड मुआवजा रोकना गैरकानूनी, अस्पताल का मृत्यु प्रमाण पत्र ही पर्याप्त

आरटी-पीसीआर रिपोर्ट के अभाव में कोविड मुआवजा रोकना गैरकानूनी, अस्पताल का मृत्यु प्रमाण पत्र ही पर्याप्त

पटना। वैश्विक महामारी कोरोना वायरस (कोविड-19) की भयावह लहर के दौरान अपनों को खोने वाले परिवारों के जख्मों पर मरहम लगाते हुए पटना उच्च न्यायालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर कहा है कि केवल तकनीकी आधार पर, विशेषकर आरटी-पीसीआर (RT-PCR) जांच रिपोर्ट उपलब्ध न होने का हवाला देकर, किसी भी पीड़ित परिवार या बेसहारा विधवा को कोविड सहायता राशि से वंचित करना पूरी तरह से अमानवीय और गलत है। उच्च न्यायालय ने यह साफ किया कि यदि अस्पताल द्वारा जारी किए गए मृत्यु प्रमाण पत्र में मौत का कारण कोविड-19 दर्ज है, तो उसे मुआवजे के दावे के लिए एक पर्याप्त, विश्वसनीय और निर्णायक साक्ष्य माना जाएगा। यह अहम निर्देश पटना हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति आलोक कुमार की एकलपीठ ने मुंगेर निवासी आशा देवी द्वारा दायर एक रिट याचिका पर विस्तार से सुनवाई करते हुए दिया। न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों और तथ्यों के अनुसार, याचिकाकर्ता आशा देवी के पति अजय कुमार शर्मा का निधन 21 मई 2021 को मुंगेर स्थित सिटी क्रिटिकल हॉस्पिटल में इलाज के दौरान हो गया था। उस विकट समय में अस्पताल प्रबंधन की ओर से जो मृत्यु प्रमाण पत्र निर्गत किया गया था, उसमें स्पष्ट रूप से मरीज की मृत्यु का मुख्य कारण कोविड-19 संक्रमण ही बताया गया था।

न्यायमूर्ति आलोक कुमार की एकलपीठ का कड़ा रुख

इस पूरे मामले में स्थानीय जिला प्रशासन और स्वास्थ्य महकमे की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। याचिकाकर्ता के अधिवक्ता की ओर से अदालत को यह जानकारी दी गई कि मुंगेर जिला प्रशासन ने 20 मार्च 2023 को जारी अपने आधिकारिक मेमो (संख्या 299) के माध्यम से मृतक अजय कुमार शर्मा का नाम कोविड मृतकों की स्वीकृत सूची में शामिल कर लिया था। इसके लिए बाकायदा अनुग्रह राशि का आवंटन भी राज्य सरकार की तरफ से कर दिया गया था। लेकिन, सिस्टम की संवेदनहीनता देखिए कि भुगतान की प्रक्रिया को अंतिम समय में रोक दिया गया। जब मृतक की पत्नी ने न्याय की गुहार लगाते हुए मुंगेर के जिलाधिकारी, स्वास्थ्य विभाग और आपदा प्रबंधन विभाग के अपर मुख्य सचिव के समक्ष कई बार चक्कर काटे, तो तीन सदस्यीय जिला स्वास्थ्य समिति ने महज़ आरटी-पीसीआर रिपोर्ट न होने का बेतुका तर्क देकर उनके जायज दावे को सिरे से खारिज कर दिया। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य स्वास्थ्य विभाग के उस पत्र (संख्या 186-11, दिनांक 9 मार्च 2022) का प्रमुखता से संज्ञान लिया, जिसमें सरकार ने खुद यह साफ निर्देश दिया था कि सरकारी पोर्टल पर किसी तकनीकी खामी के कारण दस्तावेज अपलोड न होने या केवल कोविड टेस्ट रिपोर्ट के अभाव को मुआवजा रोकने का आधार बिल्कुल नहीं बनाया जा सकता। इसके अतिरिक्त, अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के उन दिशा-निर्देशों का भी हवाला दिया, जिसमें साफ कहा गया है कि कोविड सर्टिफिकेट का अभाव अपने आप में निर्णायक नहीं है, बशर्ते क्लीनिकल तौर पर मौत की वजह कोरोना रही हो और मृतक का नाम जिला स्तर पर स्वीकृत सूची में शामिल हो।

चार सप्ताह के भीतर भुगतान का सख्त अल्टीमेटम

सभी पक्षों की दलीलें सुनने और सरकारी कार्यप्रणाली के सूक्ष्म अवलोकन के बाद, अदालत ने अधिकारियों के फैसले को अनुचित और मनमाना करार दिया। हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन को यह सख्त अल्टीमेटम दिया है कि वे इस मामले पर चार सप्ताह के भीतर नए सिरे से विचार करें। अदालत ने ‘बिहार कोविड सहायता योजना, 2022’ के प्रावधानों के तहत याचिकाकर्ता को बिना किसी और विलंब के पात्र अनुग्रह राशि का एकमुश्त भुगतान सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। हाईकोर्ट के इस सख्त फैसले से राज्य भर में उन दर्जनों पीड़ित परिवारों को एक बड़ी कानूनी राहत मिलने की उम्मीद जगी है, जिनकी मुआवजे की फाइलें केवल कागजी कमियों और तकनीकी कारणों से सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रही हैं।

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