
पटना। मुज्जफरपुर जिले के पूर्वी इलाके में बागमती नदी ने एक बार फिर अपना रौद्र रूप दिखाना शुरू कर दिया है। नदी के जलस्तर में हुई बेतहाशा वृद्धि के कारण औराई, कटरा और गायघाट प्रखंड के दर्जनों गांव बाढ़ की विनाशकारी चपेट में आ गए हैं। हालात इतने भयावह हैं कि लोगों के घरों में बाढ़ का पानी प्रवेश कर चुका है और जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया है। एक तरफ जहां बाढ़ पीड़ित त्राहिमाम कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जिला प्रशासन के राहत और बचाव के दावे पूरी तरह कागजी साबित हो रहे हैं।केंद्रीय जल आयोग और जिला प्रशासन द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, बागमती नदी कटौझा में खतरे के निशान से 1.30 मीटर और बेनीबाद में 1.24 मीटर ऊपर बह रही है। नदी के इस उफान ने स्थिति को बेहद चिंताजनक बना दिया है। बाढ़ के इस तांडव से सबसे अधिक तबाही कटरा और गायघाट प्रखंड के इलाकों में देखने को मिल रही है। कटरा के लगभग आधा दर्जन से अधिक गांव पूरी तरह से जलमग्न होकर ‘जल समाधि’ की स्थिति में पहुंच चुके हैं। सिर्फ कटरा इलाके में ही करीब आठ हजार की आबादी सीधे तौर पर इस प्राकृतिक आपदा का दंश झेल रही है। अब यह बाढ़ का पानी कटरा से सटे गायघाट प्रखंड के निचले इलाकों में भी तेजी से फैलने लगा है, जिससे नए क्षेत्रों में खौफ का माहौल है।
औराई, कटरा और गायघाट में बाढ़ का तांडव
प्रभावित इलाकों में जमीनी हकीकत रोंगटे खड़े करने वाली है। दर्जनों गांवों का मुख्य सड़क से संपर्क पूरी तरह टूट चुका है। लोग जान जोखिम में डालकर नाव के सहारे या कमर भर पानी से होकर आवागमन करने को मजबूर हैं। सैकड़ों घरों के भीतर दो से तीन फीट तक पानी भर जाने के कारण ग्रामीणों ने अपने ही घरों की छतों या ऊंचे स्थानों पर तिरपाल तानकर शरण ले रखी है। विकट परिस्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बाढ़ प्रभावित लोग अपने घरों के अंदर चौकी (तख्त) पर ईंटों का चूल्हा रखकर किसी तरह दो वक्त का खाना बनाने को विवश हैं। मवेशियों के चारे का भी गंभीर संकट उत्पन्न हो गया है।इन विकट परिस्थितियों के बीच प्रशासनिक अमले का रवैया सवालों के घेरे में है। अधिकारी लगातार यह दावा कर रहे हैं कि स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में है। कम्युनिटी किचन चलाने से लेकर राहत व बचाव कार्य की सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। हालांकि, धरातल पर प्रशासन के इन हवाई दावों की पोल खुलती नजर आ रही है।
8 हजार से अधिक आबादी प्रभावित
बाढ़ पीड़ितों का सीधा आरोप है कि उन्हें भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है। प्रभावित क्षेत्रों में न तो पर्याप्त सरकारी नावें उपलब्ध कराई गई हैं और न ही पीड़ितों के लिए भोजन, पीने का शुद्ध पानी व पॉलीथिन (तिरपाल) की कोई ठोस व्यवस्था की गई है। सरकारी घोषणाओं और जमीनी हकीकत के बीच का यह भारी फासला बाढ़ प्रभावित परिवारों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहा है। यदि जल्द ही युद्ध स्तर पर राहत कार्य शुरू नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में महामारी और भुखमरी का खतरा भी मंडराने लगेगा।



