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कोटे में कोटा हमारा अधिकार, किसी की धमकी से डरने वाले नहीं: संतोष सुमन

मोतिहारी। बचपन की मासूमियत और खेलकूद की उम्र में एक और बेटी सामाजिक कुरीतियों और अमानवीय यातनाओं का शिकार हो गई। विंध्येश्वरी, जिसे आस-पड़ोस के लोग प्यार से ‘बिंदा’ कहते थे, अब इस दुनिया में नहीं है। उसकी असमय मौत ने बाल-विवाह और घरेलू शोषण जैसी गहरी जड़ों वाली कुप्रथाओं पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।बिंदा का जीवन उस दिन से ही नर्क बन गया था, जब उसके घर में नई (सौतेली) माँ ने कदम रखा। खेल-कूद की उम्र में उस नन्ही बच्ची के कंधों पर पूरे घर के कामकाज का अमानवीय बोझ डाल दिया गया। चिलचिलाती धूप हो या कड़ाके की ठंड, बिंदा को चूल्हा-चौका करने और भद्दी गालियां सहने के लिए मजबूर किया जाता रहा। मासूम की आँखों में बचपन के सपनों की जगह एक स्थायी खौफ ने ले ली थी। पड़ोसियों के अनुसार, छोटी-सी गलती पर भी उसे कठोर शारीरिक दंड दिया जाता था, लेकिन ‘पारिवारिक मामला’ मानकर किसी ने भी इस अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाने की जहमत नहीं उठाई।यातनाओं का सिलसिला यहीं नहीं थमा। सौतेली माँ और परिवार ने अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए उस अबोध बच्ची का विवाह एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति से कर दिया। जिस उम्र में बच्चियों के हाथों में किताबें और खिलौने होने चाहिए, बिंदा के हाथों में शादी की मेंहदी और पारिवारिक जिम्मेदारियों की बेड़ियाँ पहना दी गईं। यह बेमेल और गैर-कानूनी विवाह उसके कोमल शरीर और मन के लिए एक जानलेवा सदमा साबित हुआ।लगातार शारीरिक और मानसिक शोषण, कुपोषण और बाल-विवाह के बोझ तले दबकर अंततः बिंदा ने दम तोड़ दिया। उसकी मौत महज एक बीमारी या हादसा नहीं, बल्कि उस सामाजिक व्यवस्था की नाकामी है जो बंद दरवाजों के पीछे हो रहे जुल्मों पर आंखें मूंद लेती है। बिंदा की खामोश चीखें आज भी उन तमाम लोगों से सवाल पूछ रही हैं, जो सब कुछ देखकर भी मूकदर्शक बने रहे। यह घटना प्रशासन और समाज दोनों के लिए एक कड़ा सबक है कि बाल अधिकारों की रक्षा के लिए अब महज कागजी कानूनों से आगे बढ़कर जमीनी स्तर पर चुप्पी तोड़नी होगी।

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