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समान नागरिक संहिता (UCC) लागू होने तक पर्सनल लॉ से ही तय होंगे मुस्लिमों के वैवाहिक अधिकार।

पटना। उच्च न्यायालय ने पारिवारिक पेंशन को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जब तक देश में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू नहीं होती या मुस्लिमों में बहुविवाह पर रोक लगाने वाला कोई कानून नहीं बनता, तब तक राज्य सरकार मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुई वैध दूसरी शादी के आधार पर किसी विधवा को पारिवारिक पेंशन देने से इनकार नहीं कर सकती।क्या है पूरा मामला?यह महत्वपूर्ण आदेश जस्टिस पूर्णेंदु सिंह की एकलपीठ ने स्वास्थ्य विभाग के दिवंगत सरकारी कर्मचारी मो. उस्मान की दूसरी पत्नी नजमा खातून की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि मो. उस्मान ने अपने जीवनकाल में ही अपने पेंशन भुगतान आदेश (पीपीओ) में सुधार के लिए आवेदन दिया था। उन्होंने अपनी मृत पहली पत्नी का नाम हटाकर दूसरी पत्नी (नजमा खातून) और पहली पत्नी के पुत्र की जगह दूसरी पत्नी से उत्पन्न पुत्री का नाम दर्ज करने का आग्रह किया था।

हालांकि, पति के निधन के बाद जब नजमा खातून ने स्वास्थ्य विभाग से पारिवारिक पेंशन की गुहार लगाई, तो विभाग ने यह कहते हुए उनका दावा खारिज कर दिया कि पहली पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी अवैध है।स्वास्थ्य विभाग के इस फैसले को चुनौती देते हुए नजमा खातून ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने विभाग की दलील को सिरे से खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक विधायिका द्वारा कोई नया कानून नहीं लाया जाता, तब तक मुस्लिमों के वैवाहिक अधिकार और उनके दायित्व ‘मोहम्मडन पर्सनल लॉ’ से ही संचालित होंगे।अदालत ने यह भी साफ किया कि किसी मुस्लिम पुरुष की शादी की वैधता की जांच उसी पर्सनल लॉ के तहत होगी, जो उस पर लागू है; बशर्ते सरकारी सेवा शर्तों में इसके लिए कोई स्पष्ट वैधानिक रोक न हो।अब आगे क्या? पटना हाईकोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग को सख्त निर्देश दिया है कि वह नजमा खातून को नियमानुसार पारिवारिक पेंशन का लाभ देने के लिए त्वरित कार्रवाई करे। कानूनी जानकारों का मानना है कि इस निर्णय के बाद अब बिहार में सरकारी नौकरी में कार्यरत मुस्लिम कर्मियों की दूसरी पत्नी भी पारिवारिक पेंशन पाने की पूरी हकदार होंगी, बशर्ते कि उनकी शादी मुस्लिम पर्सनल लॉ के मानकों पर पूरी तरह वैध हो। अब कोई भी सरकारी विभाग महज पहली पत्नी के होने का हवाला देकर पारिवारिक पेंशन के लाभ से वंचित नहीं कर सकेगा।

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