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बिहार बाढ़: 45 लाख लोग प्रभावित, फिर भी मोदी-शाह खामोश; तेजस्वी यादव का केंद्र पर तीखा प्रहार

गुजरात और बिहार की स्थिति में भेदभाव का आरोप

पटना। बिहार में उफनती नदियों और बाढ़ की भयावह होती तस्वीरों के बीच राज्य का सियासी पारा भी पूरी तरह से उफान पर है। नेता प्रतिपक्ष और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के वरिष्ठ नेता तेजस्वी यादव ने बाढ़ राहत और सहायता के मुद्दे पर केंद्र सरकार तथा बिहार से जुड़े केंद्रीय मंत्रियों पर जोरदार हमला बोला है। तेजस्वी ने आरोप लगाया है कि राज्य में बाढ़ से व्यापक तबाही मची है, लगभग 45 लाख की आबादी भीषण संकट का सामना कर रही है, लेकिन इसके बावजूद केंद्र सरकार की तरफ से अपेक्षित मदद और किसी विशेष राहत पैकेज का ऐलान नहीं किया गया है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर सिलसिलेवार पोस्ट करते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री ने गुजरात और बिहार के हालात की तुलना करते हुए केंद्र पर सौतेले व्यवहार का गंभीर इल्जाम लगाया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गुजरात में महज भारी बारिश या स्थानीय जलभराव की स्थिति उत्पन्न होने पर ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। वहां मुख्यमंत्री से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए हालात की जानकारी ली जाती है और एयरफोर्स से लेकर एनडीआरएफ तक को हाई अलर्ट पर रखा जाता है। तेजस्वी ने पुराने मामलों का जिक्र करते हुए याद दिलाया कि गुजरात में प्रधानमंत्री स्वयं हवाई सर्वेक्षण करते हैं और तुरंत 500 करोड़ रुपये के पैकेज के साथ सेना और वायुसेना की टीमें राहत-बचाव कार्य में लगा दी जाती हैं।

गुजरात और बिहार की स्थिति में भेदभाव का आरोप

इसके बरक्स, बिहार की दर्दनाक स्थिति का खाका खींचते हुए राजद नेता ने कहा कि राज्य में 50 से अधिक लोगों की अकाल मृत्यु हो चुकी है। हजारों मवेशी लापता हैं और किसानों के हजारों करोड़ रुपये की फसल बर्बाद हो चुकी है। उनका सीधा सवाल है कि ऐसी विकट और त्रासद परिस्थिति में भी प्रधानमंत्री और गृह मंत्री ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से फोन पर हालात का जायजा लेने की जहमत क्यों नहीं उठाई? तेजस्वी का गुस्सा केवल शीर्ष नेतृत्व तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने बिहार से चुनकर गए 30 सांसदों और मोदी कैबिनेट में शामिल सात केंद्रीय मंत्रियों की भूमिका पर भी करारा प्रहार किया। उन्होंने इन मंत्रियों को ‘फुस्स फुलझड़ी’ करार देते हुए तंज कसा कि कभी दिल्ली के सत्ता गलियारों में बिहार के मंत्रियों का भारी रुतबा हुआ करता था। लेकिन आज, आपदा की इस भीषण घड़ी में जब बिहार की जनता त्राहिमाम कर रही है, तब ये सातों मंत्री खामोश बैठे हैं। बिहार की आवाज बुलंद करने और राज्य के हक में केंद्र पर दबाव बनाने की कोई भी इच्छाशक्ति इनमें नजर नहीं आ रही है। बाढ़ के अलावा, तेजस्वी ने आकाशीय बिजली (ठनका) से होने वाली मौतों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया। उन्होंने मांग की कि हर साल बिहार में ठनका गिरने से बड़ी संख्या में लोग जान गंवाते हैं, इसलिए इसे ‘राष्ट्रीय आपदा’ की सूची में तत्काल शामिल किया जाना चाहिए। उन्होंने गुजरात की तर्ज पर बिहार के लिए भी समान केंद्रीय सहायता की पुरजोर मांग की।अंत में उन्होंने स्पष्ट किया कि विपक्ष में रहते हुए केंद्र से राहत पैकेज की मांग करना कोई निजी राजनीतिक लाभ का विषय नहीं है, बल्कि यह बिहारियों के हक की सीधी लड़ाई है। यह पैकेज राज्य सरकार के माध्यम से अंततः जनता तक ही पहुंचेगा। उन्होंने आम जनमानस से आह्वान किया कि अब चुनावी राजनीति से ऊपर उठकर बिहार के सम्मान, हिस्सेदारी और अधिकारों पर एक गंभीर और व्यापक बहस होनी चाहिए।

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