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ग्रीनफील्ड टाउनशिप से बदलेगी तस्वीर, किसानों की जमीन की कीमत होगी कई गुना

बिहार सरकार राज्य के 11 शहरों, जिनमें राजधानी पटना भी शामिल है, में ग्रीनफील्ड सैटेलाइट टाउनशिप विकसित करने की तैयारी में है। इस योजना की खास बात यह है कि इसमें किसी भी किसान या जमीन मालिक को भूमिहीन नहीं किया जाएगा। जमीन अधिग्रहण पूरी तरह उनकी सहमति से ही होगा।

योजना के तहत जमीन मालिकों का एक समूह बनाया जाएगा और उन्हें टाउनशिप परियोजना में शेयर होल्डर का दर्जा दिया जाएगा। विकसित होने के बाद कुल जमीन का कम से कम 55 प्रतिशत हिस्सा वापस मालिकों को दिया जाएगा। अनुमान है कि टाउनशिप बनने के बाद जमीन की कीमत 10 से 20 गुना तक बढ़ सकती है, जिससे किसानों को बड़ा आर्थिक लाभ मिलेगा।

नगर विकास एवं आवास विभाग के प्रधान सचिव विनय कुमार ने बताया कि लैंड पूलिंग मॉडल के जरिए यह योजना लागू की जाएगी। जो जमीन मालिक इसमें शामिल नहीं होना चाहेंगे, उनकी जमीन सरकार ऊंची कीमत पर खरीदेगी। इसके साथ ही उन्हें टीडीआर (ट्रांसफर ऑफ डेवलपमेंट राइट्स) का विकल्प भी मिलेगा, जिसके जरिए वे अतिरिक्त निर्माण अधिकार का उपयोग या बिक्री कर सकते हैं।

टाउनशिप के लिए इस साल अक्टूबर-नवंबर तक नक्शे के साथ प्रारूप जारी किया जाएगा। इसमें खाता-खेसरा के साथ पूरी जानकारी प्रकाशित होगी और लोगों से सुझाव व आपत्तियां मांगी जाएंगी। इसके बाद सहमति देने वाले किसानों के साथ बैठकर आगे की विकास योजना तय की जाएगी।

पूरी प्रक्रिया की निगरानी के लिए डीएम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई जाएगी, जबकि जमीन से जुड़े विवादों के समाधान के लिए ट्रिब्यूनल का गठन भी किया जाएगा।

सरकार ने फिलहाल चिह्नित इलाकों में जमीन की खरीद-बिक्री पर रोक लगा दी है, ताकि किसान अपनी जमीन सस्ते में न बेचें। जैसे-जैसे लोग सहमति देंगे, यह रोक हटाई जाएगी। अलग-अलग शहरों में यह रोक 2027 तक लागू रहेगी।

नई टाउनशिप को केवल आवासीय नहीं बल्कि आर्थिक गतिविधियों का केंद्र भी बनाया जाएगा। इसमें फिल्म सिटी, एयरपोर्ट और औद्योगिक क्षेत्र जैसे प्रोजेक्ट शामिल किए जाएंगे, जिससे रोजगार और आय के नए अवसर पैदा होंगे।

विकसित जमीन का बंटवारा भी तय कर दिया गया है 55 प्रतिशत जमीन मालिकों को, 22 प्रतिशत सड़कों के लिए, 15 प्रतिशत सरकार के पास, 5 प्रतिशत सार्वजनिक सुविधाओं के लिए और 3 प्रतिशत कमजोर वर्ग के लिए आरक्षित रहेगा।

कुल मिलाकर, यह योजना शहरी विकास के साथ किसानों के हितों को सुरक्षित रखने का एक नया मॉडल साबित हो सकती है।

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