
कलाकार और पारंपरिक हुनर किसी भी समाज की सांस्कृतिक पहचान होती हैं। इन्हें सम्मान और प्रोत्साहन देकर न सिर्फ कला को आगे बढ़ाया जा सकता है, बल्कि कलाकारों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर भी तैयार किए जा सकते हैं। बिहार सरकार की जीविका योजना इसी दिशा में महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम कर रही है।
वैशाली की लक्ष्मी दीदी ने अपने परिवार से मिली मिट्टी और फाइबर की मूर्तियां बनाने की कला को जीविका के माध्यम से आधुनिक कारोबार का रूप दिया है। पारंपरिक हुनर को नई तकनीक, बेहतर डिजाइन और बाजार से जोड़कर उन्होंने अपनी कला को नई पहचान देने की दिशा में कदम बढ़ाया है।
शुरुआत में लक्ष्मी दीदी जब अपने बेटे के साथ मूर्तियों को बनाने का काम शुरू किया था। तब पूंजी की अभाव में इस काम को आगे बढ़ाना आसान नहीं था। फिर जीविका से जुड़ने के बाद उन्हें 50 हजार की आर्थिक मिली। तब उनके काम का विस्तार हुआ।
आज लक्ष्मी दीदी के बनाए उत्पाद स्थानीय बाजारों के साथ-साथ Amazon, Flipkart और Meesho जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के जरिए देशभर के ग्राहकों तक पहुंच रहे हैं। उनके कारोबार को ऑनलाइन बाजार मिलने से बिक्री का दायरा भी बढ़ा है।
पारंपरिक कला को कारोबार में बदल रहीं लक्ष्मी दीदी

लक्ष्मी देवी बताती है कि,”पूरा परिवार मिलकर मिट्टी से फाइनल मूर्ति बनाते और बेचते हैं। जीविका से जुड़ने के बाद मेरा कारोबार काफी अच्छा चल रहा है। पहले यह कला परिवार की परंपरा तक सीमित थी, लेकिन जीविका से जुड़ने के बाद इसे कारोबार के रूप में आगे बढ़ाने का अवसर मिला। इससे उनके हुनर को बाजार मिला और आत्मनिर्भरता की राह भी मजबूत हुई।”
लक्ष्मी दीदी का बेटा विक्कू कुमार भी अपनी मां से यह हुनर सीखकर कारोबार में उनका साथ दे रहे हैं। परिवार की पारंपरिक कला को उन्होंने ऑनलाइन बाजार से जोड़ने का काम किया है। विक्कू बताते हैं, “मेरे पापा और दादा भी मिट्टी की मूर्तियां बनाते थे। हम इस काम को ऑनलाइन लेकर आए हैं। फाइबर से भी मूर्तियां तैयार करते हैं। रोज करीब 10 मूर्तियों के ऑर्डर मिलते हैं। जीविका ने हमें काफी मदद दी है। अब हम इस कारोबार को राष्ट्रीय स्तर पर ले जाना चाहते हैं। हमारे उत्पाद विदेश भी भेजे गए हैं।”
जीविका के सहयोग से लक्ष्मी दीदी ने न केवल अपने पारंपरिक हुनर को नई पहचान दी, बल्कि परिवार के लिए आय का एक मजबूत जरिया भी तैयार किया। उनकी कहानी बताती है कि सही सहयोग और अवसर मिले तो पारंपरिक हुनर को भी सफल कारोबार में बदला जा सकता है। इससे बिहार की कला और संस्कृति को नई पहचान मिलने के साथ महिलाओं के आत्मनिर्भर बनने की राह भी मजबूत हो रही है।



