
बिहार की जेलों में बंद विचाराधीन कैदियों और अदालतों के चक्कर लगा रहे उनके स्वजन के लिए एक बड़ी और राहत भरी खबर है। अब आपराधिक मामलों में जमानत (बेल) या अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) के लिए महीनों इंतजार नहीं करना पड़ेगा। पटना हाईकोर्ट ने न्याय प्रणाली को और अधिक जवाबदेह बनाते हुए राज्य की सभी जिला एवं सत्र अदालतों के लिए एक नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। इसके तहत अब किसी भी हाल में जमानत याचिकाओं का निपटारा अधिकतम दो महीने (60 दिन) के भीतर करना अनिवार्य कर दिया गया है।
जज को बताना होगा देरी का कारण
नई व्यवस्था के अनुसार, सामान्य तौर पर जमानत या अग्रिम जमानत की अर्जी दाखिल होने के दो महीने के भीतर अदालत को उसे मंजूर या खारिज करने पर अपना अंतिम फैसला सुनाना होगा। यदि किसी विशेष, जटिल या अपरिहार्य परिस्थिति में दो महीने की निर्धारित समयसीमा के भीतर फैसला नहीं हो पाता है, तो संबंधित न्यायाधीश को अपनी केस फाइल में इस देरी का उचित और स्पष्ट कारण दर्ज करना होगा। यानी, अब जमानत अर्जियों को ‘तारीख पे तारीख’ के जाल में फंसाकर अनिश्चित काल तक लंबित नहीं रखा जा सकेगा। दरअसल, यह पूरी कवायद सुप्रीम कोर्ट के उस सख्त निर्देश के बाद शुरू हुई है, जिसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सर्वोपरि माना गया है। हाल ही में वर्ष 2025 में ‘अन्ना वामन भालेराव बनाम महाराष्ट्र सरकार’ मामले की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि जमानत याचिकाएं किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता (संविधान के अनुच्छेद 21) से सीधे जुड़ी होती हैं। इसलिए, इनके निपटारे में होने वाली अनावश्यक देरी न्याय के मूल सिद्धांत के खिलाफ है। शीर्ष अदालत के इसी फैसले को बिहार में प्रभावी तरीके से लागू करने के लिए पटना हाईकोर्ट ने 11 बिंदुओं वाली यह विस्तृत एसओपी जारी की है। अक्सर निचली अदालतों में देखा जाता है कि पुलिस द्वारा समय पर केस डायरी (सीडी), आपराधिक इतिहास या अस्पताल से मेडिकल रिपोर्ट पेश न करने के कारण जमानत की सुनवाई टल जाती है। नई एसओपी में इस खामी पर भी कड़ा प्रहार किया गया है। हाईकोर्ट के निर्देश केवल अदालतों तक सीमित नहीं हैं; इसमें प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पुलिस अधीक्षक (एसपी), जिलाधिकारी (डीएम), लोक अभियोजक, जिला अभियोजन पदाधिकारी और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों की भी सख्त जिम्मेदारी तय की गई है। यह सुनिश्चित किया जाएगा कि अर्जी दाखिल होने के बाद जांच रिपोर्ट और जरूरी दस्तावेज समय पर अदालत पहुंच जाएं ताकि सुनवाई बाधित न हो।
कानूनी जानकारों का कहना है कि इस दो महीने की समयसीमा का मुख्य उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को तेज करना है। इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि हर मामले में आरोपी को दो महीने के भीतर जमानत मिल ही जाएगी। अदालत मामले के तथ्य, आरोपों की गंभीरता, गवाहों की सुरक्षा और कानून के प्रावधानों के आधार पर ही मेरिट पर फैसला करेगी। इस पहल का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि आरोपी को समय पर यह पता चल जाएगा कि उसकी अर्जी निचली अदालत से स्वीकार हुई है या खारिज, जिससे वह बिना समय गंवाए ऊपरी अदालत का दरवाजा खटखटा सकेगा। बिहार की अदालतों में बेल की प्रक्रिया को लेकर यह एक ऐतिहासिक बदलाव है। कई बार ऐसा होता है कि आरोपी अपनी जमानत पर सुनवाई के इंतजार में ही महीनों जेल में काट लेता है। वकीलों और परिजनों को हर अगली तारीख का लंबा इंतजार करना पड़ता है। पटना हाईकोर्ट की इस पहल से न सिर्फ जिला अदालतों में लंबित मामलों का बोझ कम होगा, बल्कि न्याय की आस में बैठे हजारों परिवारों को बड़ी राहत मिलेगी। यह कदम राज्य की न्याय प्रणाली को और अधिक पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।



