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आरक्षण नहीं तो बीजेपी को वोट नहीं’, निषाद संकल्प यात्रा में मुकेश सहनी की हुंकार

उत्तर प्रदेश। में 2027 के विधानसभा चुनाव भले ही अभी दूर हों, लेकिन निषाद समाज के आरक्षण को लेकर सियासी तपिश बढ़ने लगी है। विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के संस्थापक और बिहार के पूर्व मंत्री मुकेश सहनी ने आरक्षण के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया है। आगरा में ‘निषाद आरक्षण संकल्प यात्रा’ के तहत पहुंचे सहनी ने स्पष्ट चेतावनी दी कि यदि चुनाव से पहले समाज को आरक्षण नहीं मिला, तो निषाद समाज अपने वोट की चोट से जवाब देगा। उन्होंने मंच से हुंकार भरते हुए नारा दिया— “संकल्प एक है, आवाज एक है—आरक्षण नहीं तो भाजपा को वोट नहीं।”वीआईपी कार्यकर्ताओं द्वारा निकाली गई हजारों की संख्या में बाइक रैली के जरिये पार्टी ने ताजनगरी में जोरदार शक्ति प्रदर्शन किया। जनसैलाब को संबोधित करते हुए मुकेश सहनी ने कहा कि निषाद समाज अब अपने हक और अधिकारों को लेकर पूरी तरह जागरूक हो चुका है। पिछले 12-13 वर्षों से वह निषाद, मल्लाह, कश्यप, बिंद, केवट, और बेलदार सहित समाज की विभिन्न उपजातियों को उनका संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए संघर्षरत हैं।देश एक, तो आरक्षण की नीति अलग क्यों?सहनी ने केंद्र सरकार पर सवाल खड़े करते हुए कहा कि जब देश एक है, संविधान एक है और प्रधानमंत्री एक हैं, तो निषाद समाज के साथ अलग-अलग राज्यों में दोहरा रवैया क्यों अपनाया जा रहा है। उन्होंने पूछा कि अगर पश्चिम बंगाल और दिल्ली में निषाद समाज की जातियों को आरक्षण का लाभ मिल सकता है, तो उत्तर प्रदेश और बिहार में उन्हें इस अधिकार से वंचित क्यों रखा जा रहा है। प्रलोभनों में न आएं, वोट की ताकत पहचानेंवीआईपी प्रमुख ने समाज को चुनाव के समय बंटने से बचने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि चुनाव आते ही जाति, धर्म और पैसों के तरह-तरह के प्रलोभन दिए जाते हैं। जनता को इन झांसों में आने के बजाय अपने बच्चों की शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और भविष्य के लिए राजनीतिक निर्णय लेना चाहिए। सहनी ने याद दिलाया कि लोकतंत्र में असली मालिक जनता है और निषाद समाज की आबादी इतनी है कि वह सरकार बनाने और बदलने दोनों की क्षमता रखता है।सत्ता नहीं, आने वाली पीढ़ियों के लिए है लड़ाईअपने शुरुआती संघर्षों का जिक्र करते हुए सहनी ने कहा कि वह खुद एक गरीब मछुआरा परिवार से आते हैं। महज 18 साल की उम्र में मुंबई जाकर मजदूरी की, लेकिन समाज की बदहाली देखकर आराम की जिंदगी छोड़ दी। उन्होंने कहा, “मेरे लिए मंत्री पद मायने नहीं रखता। समाज का सम्मान सबसे बड़ा है। हमारी यह लड़ाई सत्ता के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य और गरीबी व पिछड़ेपन के खिलाफ है।” अंत में मुकेश सहनी ने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया कि इस लड़ाई की गूंज अब दिल्ली और लखनऊ तक जाएगी। उन्होंने निर्देश दिया कि गांव-गांव जाकर समाज को जगाएं और जब तक आरक्षण नहीं मिल जाता, तब तक यह संघर्ष जारी रहेगा।

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