
पटना। बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू हुए करीब एक दशक का समय पूरा होने जा रहा है। साल 2016 में जिस नेक इरादे और सामाजिक बदलाव की उम्मीद के साथ शराब पर प्रतिबंध लगाया गया था, उसने कई सकारात्मक परिवर्तन किए। लेकिन अब राज्य सरकार और पुलिस-प्रशासन के सामने एक नई और बेहद खतरनाक चुनौती तेजी से सिर उठा रही है। शराब की राह बंद होने के बाद तस्करों और नशेड़ियों ने ‘सूखे नशे’ (ड्रग्स, अफीम, चरस, हेरोइन) का विकल्प तलाश लिया है। राज्य में इसके बढ़ते मामलों पर गंभीर चिंता जाहिर करते हुए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने कहा है कि शराबबंदी के बाद अब सरकार को इन मादक पदार्थों के खिलाफ बड़ा और निर्णायक अभियान चलाना होगा। उन्होंने स्पष्ट चेतावनी दी कि अगर बिहार की युवा पीढ़ी इस नए नशे की गिरफ्त में आ गई, तो राज्य के विकास की रफ्तार थम जाएगी और बिहार पूरी तरह बर्बाद हो जाएगा।
युवाओं के भविष्य पर मंडराता बड़ा खतरा
सरकार की सबसे बड़ी चिंता केवल मादक पदार्थों की बरामदगी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर उस युवा पीढ़ी पर पड़ रहा है, जिस पर भविष्य के बिहार की नींव टिकी है। मुख्यमंत्री ने तल्ख लहजे में कहा कि राज्य का भविष्य युवाओं की मेधा और ऊर्जा पर निर्भर है। अगर यही युवा वर्ग नशे की अंधेरी गलियों में भटक गया, तो विकास की सारी योजनाएं शून्य हो जाएंगी। आज सुदूर गांव का कोई होनहार छात्र जो पढ़ाई कर आगे बढ़ना चाहता है, वह नशे की गलत संगत में पड़कर अपनी राह से भटक रहा है। जब एक युवा पीछे छूटता है, तो उसका नुकसान सिर्फ उस अकेले परिवार को नहीं, बल्कि पूरे समाज और अंततः पूरे बिहार राज्य को उठाना पड़ता है। शराब पर कड़े प्रतिबंध के बाद राज्य में नशे के दूसरे और ज्यादा घातक विकल्पों की ओर लोगों का झुकाव बढ़ा है। मद्य निषेध विभाग और पुलिस के आंकड़े भी इसकी गवाही दे रहे हैं। मुख्यमंत्री ने जो आंकड़े पेश किए, वे वाकई चौंकाने वाले हैं। वर्ष 2024 में पूरे बिहार में जहां 282 किलो चरस जब्त की गई थी, वहीं 2025 में इसकी जब्ती का आंकड़ा उछाल मारकर 400 किलो तक पहुंच गया। इसी तरह, हेरोइन की बरामदगी 42 किलो से बढ़कर 65 किलो और अफीम की जब्ती 10 किलो से छलांग लगाकर 77 किलो तक पहुंच गई है। ये आंकड़े स्पष्ट संकेत हैं कि शराब की जगह अब सूखे नशे ने ले ली है और इसके तस्कर गांव-गांव तक जड़ें जमा रहे हैं।
राजस्व की चिंता छोड़ लिया गया था ऐतिहासिक फैसला
इस नई चुनौती का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री ने शराबबंदी को बिहार के राजनीतिक इतिहास का साहसिक फैसला बताया। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2016 में तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जब यह निर्णय लिया था, तब सरकार के सामने राजस्व के बड़े नुकसान की चुनौती थी। उस समय राज्य का कुल वार्षिक बजट करीब 50 से 55 हजार करोड़ रुपये ही हुआ करता था। इतने सीमित बजट के बावजूद, सरकार ने राजस्व की परवाह किए बिना केवल समाज की भलाई के लिए शराबबंदी जैसा कठोर फैसला लिया। अब सरकार को सूखे नशे के खिलाफ भी उसी सख्ती के साथ मैदान में उतरना होगा, जिस तरह शराबबंदी के लिए किया गया था। राज्य के ऐसे आठ जिलों को विशेष रूप से टारगेट किया गया है, जहां नशे का बढ़ता कारोबार सबसे ज्यादा चिंता का सबब है। इनमें राजधानी पटना, वैशाली, समस्तीपुर और आरा (भोजपुर) समेत कई संवेदनशील इलाके शामिल हैं। इन जिलों में विशेष अभियान चलाया जाएगा। साथ ही, सीमावर्ती (बॉर्डर) इलाकों पर भी खुफिया तंत्र के जरिए विशेष नजर रखने की सख्त हिदायत दी गई है ताकि खेप को राज्य में घुसने से पहले रोका जा सके। सम्राट चौधरी ने स्पष्ट किया कि नशे के खिलाफ लड़ाई केवल कड़े कानून या पुलिस के डंडे के जोर पर सफल नहीं हो सकती। इसके लिए गांव, पंचायत और समाज के हर वर्ग को इस महाभियान से जोड़ना अनिवार्य है। सरकार के सामने चुनौती शराबबंदी के बाद पैदा हुए इस नए ड्रग सिंडिकेट के जाल को तोड़ने की है। इसके लिए परिवार के सदस्यों, स्कूल के शिक्षकों, पंचायत प्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों को अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। यह लड़ाई सिर्फ नशा रोकने की नहीं, बल्कि बिहार की उस युवा पीढ़ी को बचाने की है, जिसके मजबूत कंधों पर कल का नया बिहार खड़ा होगा।



