
पटना। बिहार विधान परिषद के 03-सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव से ठीक पहले सियासी हलचल तेज हो गई है। मतदान की तारीख नजदीक आते ही राजनीतिक समीकरणों में बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (रालोसपा) के बागी नेता सह निर्दलीय प्रत्याशी रामपुकार सिन्हा ने चुनावी अखाड़े से हटने का आधिकारिक एलान कर दिया है। मैदान छोड़ने के साथ ही उन्होंने एनडीए समर्थित उम्मीदवार आनंद पुष्कर को अपना खुला समर्थन देने की घोषणा की है। उनके इस फैसले को एनडीए खेमे के लिए एक बड़ी राजनीतिक कामयाबी और चुनावी गणित साधने की दिशा में अहम मोड़ माना जा रहा है।
बदलेंगे मुकाबले के समीकरण
सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में मुकाबला लगातार बेहद कड़ा और बहुकोणीय नजर आ रहा था। विभिन्न दलों के दिग्गजों और निर्दलीय चेहरों के आमने-सामने होने से मतों के बिखराव की आशंका गहरा रही थी। ऐसे नाजुक मोड़ पर रामपुकार सिन्हा द्वारा कदम पीछे खींचने और सीधे आनंद पुष्कर के पक्ष में लामबंद होने से एनडीए को भारी मनोवैज्ञानिक बढ़त मिली है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शिक्षक बिरादरी के बीच रामपुकार सिन्हा की जमीनी पकड़ और व्यक्तिगत जनसंपर्क काफी पुराना रहा है। उनके हटने से एनडीए उम्मीदवार आनंद पुष्कर की स्थिति पहले से अधिक मजबूत हो गई है और विरोधी दलों की पेशानी पर बल पड़ गए हैं।
मतदान के दिन ही तय होगा नफा-नुकसान
सामान्य विधानसभा या लोकसभा चुनावों के विपरीत शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की चुनावी प्रकृति पूरी तरह अलग होती है। यहां दलीय प्रतिबद्धता से ज्यादा उम्मीदवारों की व्यक्तिगत छवि, शिक्षकों के लंबित मुद्दों को उठाने की तत्परता और शिक्षक यूनियनों के बीच पकड़ निर्णायक साबित होती है। वेतनमान, सेवा शर्त नियमावली और पेंशन जैसे मुद्दे इस चुनाव की मुख्य धुरी बने हुए हैं। ऐसे में रामपुकार सिन्हा का एनडीए खेमे में जाना इस बात का संकेत है कि शिक्षक राजनीति के एक खास वर्ग को एकजुट करने की कवायद तेज हो चुकी है। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि सिन्हा के समर्थक और उनसे जुड़े शिक्षक मतदाता किस हद तक एनडीए प्रत्याशी के पक्ष में मतदान केंद्र तक पहुंचते हैं। रामपुकार सिन्हा के इस फैसले ने मुकाबले की तस्वीर भले ही साफ कर दी हो, लेकिन अंतिम फैसला मतपेटी से ही तय होगा। विरोधी दलों के रणनीतिकार भी इस नए समीकरण की काट ढूंढने में जुट गए हैं। शिक्षक वर्ग बेहद प्रबुद्ध और संवेदनशील मतदाता माना जाता है, जो केवल शीर्ष नेताओं की घोषणाओं के बजाय अपने अधिकारों और भविष्य के रोडमैप को प्राथमिकता देता है। रामपुकार सिन्हा की यह पहल एनडीए प्रत्याशी आनंद पुष्कर के लिए कितनी फलदायी साबित होती है और क्या यह समर्थन जमीनी स्तर पर वोट में तब्दील हो पाता है, इसका सटीक आकलन मतगणना के दिन ही हो सकेगा। फिलहाल, इस ताजा घटनाक्रम ने सारण के चुनावी तापमान को चरम पर पहुंचा दिया है।



