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क्या बिहार में जातीय समीकरण टूट रहा है? बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव के परिणाम से उपजे सवाल

बीजेपी का अभेद्य किला माने जाने वाला बिहार का बांकीपुर सीट पर जन सुराज के प्रशांत किशोर ने प्रचंड जीत दर्ज कर पूरे देश में चर्चा का विषय बना दिया है। बांकीपुर सीट बीजेपी के लिए प्रतिष्ठा का विषय इसलिए भी था, क्योंकि यह सीट वर्तमान बीजेपी राष्ट्रीय अध्यक्ष का था और शायद इसलिए बीजेपी ने सैकड़ो विधायक, सांसद, केंद्रीय मंत्री, स्टार प्रचारक, मुख्यमंत्री ने मिलकर खुद को प्रचार में झोंक दिया था।

साल 1995 से (तब पटना पश्चिमी) लगातार जीतती रही भाजपा को आज करारी शिकस्त मिली है। वर्तमान बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन साल 2006 से लगातार इस सीट से विधायक बनते आ रहे थे, इसके पूर्व नितिन नवीन के पिता नवीन किशोर सिन्हा 1995 से विधायक रह चुके थे, जिनके निधन के बाद ये सीट उनके बेटे नितिन नवीन को दिया गया था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के वजह से नितिन नवीन ने विधायक पद से इस्तीफा दे दिया था , जिस वजह से ये सीट खाली थी।

बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की जीत के बाद राजनीतिक गलियारों में एक चर्चा तेज हो गई है कि क्या बिहार में जातीय समीकरण टूटने लगा है?, क्या इसका असर आने वाले प्रदेश के अन्य चुनाव पर भी पड़ेगा? बांकीपुर विधानसभा क्षेत्र को कायस्थ बहुल इलाका माना जाता रहा है, कायस्थ जाति के वोटर निर्णायक माने जाते हैं और इस सीट से लगातार जीत दर्ज करने वाले विधायक भी इसी जाति के रहे हैं, ऐसे में प्रशांत किशोर (ब्राह्मण) का जितना यह संदेश देता है कि अब बिहार में भी लोग जाति से ऊपर उठ कर एक मजबूत और शिक्षित उम्मीदवार चाहते हैं।

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या आने वाले दिन में इस सीट के परिणाम का प्रभाव पूरे प्रदेश की राजनीति पर पड़ेगा? क्या आने वाले दिनों में जनता उम्मीदवार को देखकर वोट करेगी? क्या जाति और पार्टी से बड़ी प्राथमिकता लोग उम्मीदवार को देंगे? सवाल बहुत सारे हैं, लेकिन इसका स्पष्ट जवाब शायद भविष्य में होने वाले चुनाव में मिले|

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