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गंगा का पानी उतरा पर आफत बरकरार, राहत शिविरों में मच्छरों और जहरीले जीवों का आतंक

डेंगू के मुहाने पर राहत शिविर, रतजगा करने को मजबूर पीड़ित

पटना। बिहार में गंगा नदी का जलस्तर घटने से तबाही की रफ्तार भले ही थम गई हो, लेकिन बाढ़ पीड़ितों का दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा है। दियारा और तटीय इलाकों से विस्थापित होकर राहत शिविरों तथा सड़कों के किनारे शरण लिए परिवारों के सामने अब जानलेवा चुनौतियां खड़ी हैं। दिन तो जैसे-तैसे कट जाता है, लेकिन शाम ढलते ही शिविरों में मच्छरों की फौज टूट पड़ती है। इसके अलावा बाढ़ के गंदे पानी के साथ निकल रहे सांप और बिच्छू जैसे जहरीले जीव खुले में सो रहे लोगों के लिए नया काल बन गए हैं।जेपी गंगा पथ और दानापुर के आसपास बने अस्थायी शिविरों की स्थिति बेहद नारकीय हो चुकी है। दानापुर दियारा के बिशुनपुर गांव की पार्वती देवी का कहना है कि राहत शिविरों में पर्याप्त फॉगिंग और ब्लीचिंग पाउडर के छिड़काव का कोई पुख्ता इंतजाम नहीं है। नतीजतन, पूरी रात बच्चों को गोद में लेकर मच्छरों से बचाते हुए काटनी पड़ती है। डेंगू, मलेरिया और डायरिया जैसी जलजनित बीमारियों का साया लगातार मंडरा रहा है। पानी के साथ बहकर आ रहे जहरीले कीट-पतंगों और सांपों के डर से लोग जमीन पर आंख मूंदने से भी कतरा रहे हैं।

आशियाना डूबा, भविष्य अटका

स्वास्थ्य के संकट के साथ-साथ हादसों की आशंका भी गहरा गई है। जेपी गंगा पथ के किनारे प्लास्टिक तानकर रह रहे परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती छोटे बच्चों को तेज रफ्तार गाड़ियों से बचाना है। दिन-रात फर्राटा भरते वाहनों के बीच जरा-सी लापरवाही बड़े हादसे का कारण बन सकती है। माता-पिता दिनभर बच्चों की निगरानी में उलझे रहते हैं। रात के घने अंधेरे में यह खतरा और भी विकराल रूप ले लेता है।बाढ़ की इस विभीषिका ने नौनिहालों के भविष्य पर भी ताला लगा दिया है। बस्ते और कॉपियां पानी में भीग चुकी हैं, और स्कूल बंद होने से पढ़ाई पूरी तरह ठप है। परिजनों का कहना है कि हर मानसून में उनका यही हाल होता है; साल में दो से तीन महीने बच्चों की पढ़ाई का भारी नुकसान होता है।

जेपी गंगा पथ पर जिंदगी दांव पर

इसके अलावा घर छोड़कर भागे परिवारों को पीछे छूटे आशियाने और मवेशियों की चिंता सता रही है। जेपी गंगा पथ पर्यटन घाट के समीप रह रहे बीरेन्द्र लाल ने बताया कि प्रशासन का चूड़ा-मीठा और पॉलिथीन का सहारा फौरी राहत तो दे सकता है, मगर जिंदगी की गाड़ी पटरी से उतर चुकी है। पीड़ितों का कहना है कि जलस्तर में गिरावट के बाद अब कीचड़ और बदबू का सामना करना होगा। राहत शिविरों में फंसी यह आबादी अब केवल पानी सूखने और सुरक्षित अपने घरों को लौटने की राह देख रही है।

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