
पटना। अदालतों का काम न्याय देना है, न कि व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने का अखाड़ा बनना। पटना हाईकोर्ट ने द्वेषपूर्ण और अनावश्यक मुकदमेबाजी पर कड़ा रुख अख्तियार करते हुए एक बार फिर यह सख्त संदेश दिया है। व्यक्तिगत रंजिश के लिए आपराधिक न्याय प्रणाली के दुरुपयोग की कड़ी निंदा करते हुए, हाईकोर्ट ने एक शिकायत मामले से उत्पन्न संपूर्ण आपराधिक कार्यवाही को सिरे से रद्द (Quash) कर दिया है।जस्टिस सोनी श्रीवास्तव की पीठ ने ‘राकेश कुमार तिवारी बनाम बिहार राज्य व अन्य’ (आपराधिक विविध सं. 60085/2023) मामले में अपना विस्तृत फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के उस यांत्रिक रवैये पर भी गहरी नाराजगी जताई, जिसमें बिना ठोस सबूतों के संज्ञान ले लिया गया था। अदालत ने पटना के न्यायिक मजिस्ट्रेट (प्रथम श्रेणी) द्वारा 5 मई, 2025 को पारित संज्ञान आदेश को निरस्त कर दिया है।
क्या था पूरा मामला और कैसे शुरू हुआ विवाद?
इस कानूनी लड़ाई की पटकथा 20 अक्टूबर, 2022 को लिखी गई थी, जब विरोधी पक्ष (शिकायतकर्ता) शीला तिवारी ने एक शिकायत दर्ज कराई। बाद में इसे सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत जांच के लिए भेजा गया और पटना के कदमकुआं थाने में कांड संख्या 281/2023 दर्ज किया गया। पुलिस ने मामले की गहन जांच की और 30 अप्रैल, 2024 को अपनी अंतिम रिपोर्ट (क्लोजर रिपोर्ट) सौंप दी। पुलिस जांच में यह पूरा मामला ही झूठा पाया गया था।हैरानी की बात यह रही कि निचली अदालत ने पुलिस की इस क्लोजर रिपोर्ट को औपचारिक रूप से स्वीकार तो कर लिया, लेकिन शिकायतकर्ता द्वारा दायर एक विरोध याचिका (प्रोटेस्ट पिटीशन) को ही मूल शिकायत मानकर 5 मई, 2025 को आईपीसी की धारा 384 (रंगदारी) के तहत मामले में संज्ञान ले लिया।
हवा-हवाई आरोप: मुंबई में थे याचिकाकर्ता, लगा दिया दिल्ली का आरोप
सुनवाई के दौरान मामले के तथ्य जब हाईकोर्ट के सामने आए, तो आरोपों का खोखलापन उजागर हो गया। शिकायतकर्ता का आरोप था कि याचिकाकर्ता राकेश कुमार तिवारी ने दिल्ली पुलिस को निर्देश देकर उनके पति के कार्यालय में तोड़फोड़ करवाई। कोर्ट ने इस आरोप को सिरे से काल्पनिक और बेतुका माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि दिल्ली पुलिस एक अलग मामले में अपने वैधानिक कर्तव्यों का पालन कर रही थी। सबसे बड़ी बात यह साबित हुई कि जिस वक्त की यह कथित घटना है, उस समय याचिकाकर्ता (जो बिहार क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष हैं) न तो घटनास्थल पर थे और न ही पटना में। वे उस वक्त बीसीसीआई (BCCI) की एक महत्वपूर्ण नामांकन प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए मुंबई में मौजूद थे। साथ ही, आईपीसी की धारा 384 (रंगदारी) के मूल तत्व इस मामले में कहीं टिकते ही नहीं थे। जस्टिस श्रीवास्तव के ऐतिहासिक फैसले का एक अहम पहलू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के नए प्रावधानों को लेकर था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीएनएसएस की धारा 223(1) के तहत यह अनिवार्य वैधानिक प्रावधान है कि किसी भी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी को नोटिस जारी किया जाए और उसे सुनवाई का अवसर मिले।निचली अदालत से मंगवाई गई रिपोर्ट में यह साफ हो गया कि संज्ञान लेने से पहले याचिकाकर्ता को कोई नोटिस या समन नहीं भेजा गया था। हाईकोर्ट ने इसे प्राकृतिक न्याय के खिलाफ बताते हुए एक “गंभीर त्रुटि” करार दिया और कहा कि यह आदेश कानूनी रूप से अमान्य है। विपक्षी दल के वकीलों ने कोर्ट में यह तकनीकी आपत्ति उठाई कि चूंकि मूल एफआईआर को चुनौती देने वाली याचिका निष्प्रभावी हो चुकी है, इसलिए नई याचिका दायर होनी चाहिए। लेकिन जस्टिस श्रीवास्तव ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों (जैसे सुगंधा बनाम पी. राजकुमार) का हवाला देते हुए इसे खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने साफ कहा कि याचिकाकर्ता को नई याचिका दायर करने के लिए मजबूर करने से केवल मुकदमों का बोझ बढ़ेगा और अदालत का कीमती समय बर्बाद होगा। सुप्रीम कोर्ट के लैंडमार्क जजमेंट (हरियाणा राज्य बनाम भजन लाल और पेप्सी फूड्स लिमिटेड) का उल्लेख करते हुए हाईकोर्ट ने सख्त टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि जब किसी निर्दोष नागरिक को अर्थहीन और झूठे मुकदमों के जाल में फंसाया जाता है, तो उसे भारी मानसिक, सामाजिक और आर्थिक प्रताड़ना झेलनी पड़ती है।अदालत ने स्पष्ट किया कि विरोधियों को परेशान करने के लिए आपराधिक कानून मशीनरी का दुरुपयोग किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अंततः, कोर्ट ने इसे न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग मानते हुए शिकायत मामला संख्या 15721(C)/2024 से जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया। विधिक हलकों में हाईकोर्ट के इस कड़े फैसले को फर्जी मुकदमों पर लगाम कसने वाले एक बड़े नजीर के रूप में देखा जा रहा है।



