
डी. के. बसु गाइडलाइंस (D. K. Basu Guidelines) भारतीय कानूनी व्यवस्था में पुलिस जवाबदेही और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए एक ऐतिहासिक मील का पत्थर हैं। जून 2026 में बिहार के भोजपुर (आरा) जिले के शाहपुर थाना क्षेत्र में हुए चर्चित भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले के बाद ये गाइडलाइंस एक बार फिर देशव्यापी चर्चा और कानूनी बहस के केंद्र में आ गई हैं।
इस रिपोर्ट में हम डी. के. बसु गाइडलाइंस, उनके मूल स्वरूप और भरत तिवारी एनकाउंटर मामले में उनकी कानूनी प्रासंगिकता का विश्लेषण करेंगे।D. K. Basu Guidelines क्या हैं? समझने के लिए इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को पहले जानते हैं :
पश्चिम बंगाल के ‘लीगल एड सर्विसेज’ के कार्यकारी अध्यक्ष डी. के. बसु ने 1986 में सुप्रीम कोर्ट को एक पत्र लिखकर थानों और लॉक-अप में पुलिस बर्बरता के कारण होने वाली मौतों यानि Custodial Deaths की तरफ ध्यान खींचा था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे जनहित याचिका यानी PIL माना।
इस मामले पर ऐतिहासिक फैसला 18 दिसंबर 1996 को डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य AIR 1997 SC 610 में आया। जस्टिस कुलदीप सिंह और जस्टिस डॉ. ए. एस. आनंद की पीठ ने व्यवस्था दी कि किसी भी नागरिक को हिरासत में प्रताड़ित करना संविधान के अनुच्छेद 21 यानि जीने और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का खुला उल्लंघन है। कोर्ट ने किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने, गिरफ्तार करने या पूछताछ करने के लिए 11 अनिवार्य दिशानिर्देश जारी किए।D. K. Basu Guidelines के प्रमुख दिशानिर्देश कुछ इस प्रकार हैं :
#Name Tag अनिवार्य है यानी गिरफ्तार या पूछताछ करने वाले पुलिसकर्मियों की वर्दी पर उनका नाम और पद बिल्कुल साफ दिखना चाहिए।
#Arrest Memo अनिवार्य है यानी गिरफ्तारी के समय एक मेमो तैयार होगा, जिसमें तारीख, समय और कम से कम एक स्थानीय गवाह या परिवार के सदस्य के हस्ताक्षर होंगे।
#सूचना का अधिकार यानी गिरफ्तार व्यक्ति को अपने किसी रिश्तेदार या मित्र को हिरासत की जानकारी देने का पूरा अधिकार है।
#मेडिकल जांच ज़रूरी है मतलब गिरफ्तारी के समय शरीर पर मौजूद चोटों का रिकॉर्ड यानि Inspection Memo बनेगा और हिरासत के दौरान हर 48 घंटे में मान्यता प्राप्त डॉक्टर से मेडिकल जांच अनिवार्य होगी।
#दस्तावेजों की कॉपी मतलब गिरफ्तारी के सारे महत्वपूर्ण दस्तावेज इलाके के संबंधित मैजिस्ट्रेट के पास भेजे जाने चाहिए।इन नियमों का उल्लंघन करने पर पुलिस अधिकारियों के खिलाफ न केवल विभागीय कार्रवाई होती है, बल्कि यह अदालत की अवमानना यानि Contempt of Court का मामला बनता है, जिसकी सीधी सुनवाई हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में हो सकती है।
इन गाइडलाइंस को अभी के भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS में धारा 41B, 41C और 41D के तहत वैधानिक दर्जा दिया गया है।
अब थोड़ा भरत तिवारी मामले को देखते हैं :
भोजपुर जिले के बिलौटी गांव के रहने वाले 28 वर्षीय भरत भूषण तिवारी को 17 जून 2026 की सुबह शाहपुर इलाके में बिहार पुलिस और STF ने एक कथित पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया।
पुलिस का कहना था कि भरत तिवारी मानसिक रूप से अस्वस्थ थे और उन्होंने पुलिस टीम पर अवैध हथियार से फायरिंग की, जिसके जवाब में पुलिस को आत्मरक्षा यानि Self-Defense में गोली चलानी पड़ी।जबकि परिवार और सोशल मीडिया पर मौजूद ‘फेसबुक लाइव’ वीडियो के अनुसार, भरत तिवारी ने गोलीबारी नहीं की थी, बल्कि उन्होंने पुलिस के सामने आत्मसमर्पण यानि Surrender करने के लिए अपना हथियार जमीन पर फेंक दिया था। आरोप है कि इसके बावजूद उन्हें पांच गोलियां मारी गईं।
इस घटना के बाद बिहार में भारी राजनीतिक और सामाजिक आक्रोश फैल गया। मुख्यमंत्री द्वारा न्यायिक जांच के आदेश दिए गए और तत्कालीन शाहपुर थाना प्रभारी समेत कई पुलिसकर्मियों को सस्पेंड कर उनके खिलाफ IPC या BNS की हत्या से संबंधित धाराओं का मुकदमा दर्ज किया गया है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच चुका है।
अब समझते हैं भरत तिवारी मामले में डी. के. बसु गाइडलाइंस की प्रासंगिकता को ।
भरत तिवारी मामले में पुलिस की कार्यप्रणाली पर जो गंभीर आरोप लगे हैं, वहां D. K. Basu Guidelines और सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय-समय पर एनकाउंटर मौतों के लिए तय किए गए नियमों की प्रासंगिकता बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है:
पहली बात – आत्मसमर्पण यानी Surrender के बाद सुरक्षा का नियम – डी. के. बसु मामले का मूल सिद्धांत यह है कि राज्य या पुलिस किसी भी नागरिक को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना जीवन से वंचित नहीं कर सकती। भरत तिवारी के आखिरी फेसबुक लाइव वीडियो में कथित तौर पर उन्हें अपनी मांगें पूरी होने का आश्वासन मिलने पर पिस्तौल पुलिस की तरफ फेंकते (सरेंडर करते) देखा गया। डी. के. बसु दिशानिर्देशों के तहत, जैसे ही कोई संदिग्ध आत्मसमर्पण करता है या पुलिस की कस्टडी (नियंत्रण) में आता है, उसके जीवन की रक्षा करना राज्य की पूर्ण जिम्मेदारी बन जाती है। यदि निहत्थे होने के बाद गोली मारी गई, तो यह कस्टोडियल वायलेंस का सबसे क्रूर रूप है।
दूसरी बात – परिवार को अवैध हिरासत में रखना और सूचना न देना – भरत तिवारी के पिता काशीनाथ तिवारी का आरोप है कि घटना के वक़्त पुलिस ने उन्हें दिनभर थाने में बैठाए रखा और शाम को बेटे की मौत की खबर दी। D. K. Basu Guidelines का नियम 3 और 5 साफ कहता है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति के परिजनों को तुरंत सूचित करना अनिवार्य है और प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। परिजनों को अंधेरे में रखना और बिना उचित प्रक्रिया अपनाए किसी को थाने में रोके रखना सीधे तौर पर इन गाइडलाइंस का उल्लंघन है।
तीसरी बात – स्वतंत्र जांच और मजिस्ट्रेट की भूमिका – इस मामले में बिहार के पूर्व डीजीपी अभयानंद सहित कई विशेषज्ञों ने सवाल उठाया कि जब पुलिस किसी अपराधी को पकड़ने गई थी, तो वहां अनुमंडल पदाधिकारी (SDM) क्या कर रहे थे? डी. के. बसु गाइडलाइंस और एनकाउंटर से जुड़े नियमों के तहत, पुलिस की किसी भी ऐसी दंडात्मक कार्रवाई के बाद स्वतंत्र न्यायिक या मजिस्ट्रेट जांच यानी Judicial या Magisterial Inquiry अनिवार्य होती है ताकि यह पता लगाया जा सके कि पुलिस का ‘आत्मरक्षा’ का दावा सच है या यह एक ‘फर्जी एनकाउंटर’ (Fake Encounter) था। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में शरीर पर पाई गई 5 गोलियां पुलिस के अत्यधिक बल प्रयोग यानी Excessive Force की कहानी बयां करती हैं, जो D. K. Basu Guidelines के ‘न्यूनतम बल’ और मानवाधिकारों के सिद्धांत के विपरीत है।
चौथी बात – ये देखने वाली बात होगी कि Inspection Memo यानी गिरफ़्तारी के समय भरत के शरीर पर मौजूद चोटों का पुलिस ने क्या ज़िक्र किया है और ये कहाँ तक सही या गलत साबित होता है।
पांचवीं बात – अदालत की अवमानना’ और अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही – चूंकि डी. के. बसु के दिशानिर्देश सुप्रीम कोर्ट का सीधा आदेश हैं, इसलिए इस मामले में केवल सस्पेंशन या विभागीय जांच काफी नहीं है। यदि सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में चल रही याचिकाओं में यह साबित हो जाता है कि पुलिसकर्मियों ने गिरफ्तारी और आत्मसमर्पण की तय प्रक्रियाओं को जानबूझकर नजरअंदाज किया, तो उन पर हत्या के मुकदमे के साथ-साथ कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट यानी न्यायालय की अवमानना के तहत भी सीधी दंडात्मक कार्रवाई होगी।
इस पूरी कहानी का निचोड़ ये है कि अगर पुलिस कानून को हाथ में लेती है, तो वह कानून के रखवाले से बदलकर खुद कानून की नजर में अपराधी बन जाती है। D. K. Basu Guidelines इस मामले में यह जांचने का सबसे बड़ा पैमाना हैं कि क्या पुलिस ने कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया का पालन किया या BULLDOZER JUSTICE अथवा INSTANT JUSTICE की आड़ में एक नागरिक के मौलिक अधिकारों की हत्या कर दी। बहरहाल, इस मामले का निष्पक्ष अंत ही तय करेगा कि लोकतंत्र में D. K. Basu Guidelines जमीनी स्तर पर कितने प्रभावी हैं।



