
पटना। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच सियासी बयानबाजी अपने चरम पर है। इसी कड़ी में वरिष्ठ नेता और मंत्री सम्राट चौधरी ने विपक्ष के आरोपों का करारा जवाब देते हुए 2003 की वोटर लिस्ट से जुड़े कई अहम राज खोले हैं। उन्होंने कांग्रेस और राजद पर निशाना साधते हुए स्पष्ट किया कि बिहार में मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण की यह कोई पहली प्रक्रिया नहीं है। इससे पहले वर्ष 2003 में, जब राज्य की बागडोर तत्कालीन मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के हाथों में थी, तब भी ठीक इसी तरह एसआइआर कराया गया था। आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 2003 में जब यह प्रक्रिया अपनाई गई थी, तब राज्य में करीब 4 करोड़ 96 लाख मतदाताओं को नोटिफाई किया गया था। उस दौर में भी बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) ने घर-घर जाकर सर्वे किया था। प्रक्रिया के तहत पहले मतदाता सूची का ड्राफ्ट प्रकाशित होता था, और फिर लोगों से दावे व आपत्तियां मांगी जाती थीं। अगर किसी का नाम छूट जाता, तो पुरानी सूची में दर्ज परिवार के सदस्यों के दस्तावेजों को आधार मानकर नए नाम जोड़े जाते थे। ठीक उसी तर्ज पर 2025 के लिए 24 जून से 25 जुलाई तक यह अभियान चला है। 22 वर्षों के इस अंतराल में बिहार में मतदाताओं की संख्या बढ़कर 7 करोड़ 89 लाख 69 हजार 844 के पार पहुंच गई है, जिससे यह पुनरीक्षण और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
22 साल पहले भी बीएलओ गए थे घर-घर
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा उठाए गए सवालों पर भी तीखा प्रहार किया गया। राहुल ने नवादा के सुबोध कुमार, औरंगाबाद के अमन कुमार, राम इकबाल राय, लाल मुनी देवी, बच्चियों देवी समेत राघोपुर के कुछ परिवारों का जिक्र कर वोटर लिस्ट से नाम कटने का आरोप लगाया था। इस पर पलटवार करते हुए बयान में कहा गया कि जिन इलाकों की सालों तक सुध नहीं ली गई, वहां के कुछ लोगों को दिल्ली बुलाकर डिनर कराने से सच्चाई नहीं बदल जाती। प्रशासन और चुनाव आयोग के संज्ञान में जैसे ही ये चुनिंदा मामले आए, उन पर तुरंत जांच कर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई की गई। विपक्ष के इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया गया कि बड़े पैमाने पर 18 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के नाम काटे गए हैं। चुनावी प्रक्रिया के दौरान ऐसा कोई भी बड़ा मामला सामने नहीं आया है, जिसमें किसी बालिग ने नाम कटने की शिकायत की हो।
नाम कटने का कोई बड़ा मामला सामने नहीं आया
बयान में यह भी साफ किया गया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाता सूची का अपडेट होना एक सतत प्रक्रिया है। चुनाव आयोग के स्पष्ट नियम हैं। यदि किसी भी पात्र नागरिक का नाम छूट गया है, तो वह निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन देकर अपना नाम जुड़वा सकता है। ऐसे में एक पारदर्शी प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठाकर महज राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं।



