
बिहार की राजनीति में ताल क्षेत्र के नाम से मशहूर मोकामा विधानसभा सीट का अपना एक अलग और बेहद दिलचस्प चुनावी इतिहास रहा है। राजधानी पटना से सटे इस इलाके की सियासत में दशकों से बाहुबल और रसूख का बोलबाला रहा है। मोकामा की राजनीति का जिक्र हो और बाहुबली नेता व ‘छोटे सरकार’ के नाम से चर्चित अनंत सिंह का नाम न आए, ऐसा संभव नहीं है। लंबे समय तक इस सीट पर अनंत सिंह का एकछत्र दबदबा देखने को मिला है। लेकिन, मोकामा के इस सियासी अखाड़े में अनंत सिंह और जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के कद्दावर नेता नीरज कुमार के बीच का राजनीतिक टकराव कोई नई बात नहीं है। इन दोनों दिग्गज नेताओं के बीच वर्चस्व की यह लड़ाई करीब 11 साल पुरानी है। इस अदावत की सबसे बड़ी और स्पष्ट तस्वीर साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में पूरे सूबे ने देखी थी, जब दोनों आमने-सामने चुनावी मैदान में ताल ठोंक रहे थे। साल 2015 में मोकामा विधानसभा सीट पर हुआ मुकाबला राजनीतिक दृष्टिकोण से बेहद रोमांचक था। उस वक्त बिहार की राजनीति के समीकरण आज की तुलना में बिल्कुल अलग थे। धुर विरोधी रहे नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) और लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया था। कांग्रेस पार्टी भी इस बड़े महागठबंधन का अहम हिस्सा थी। राजनीतिक हालात ऐसे बने कि महागठबंधन के संयुक्त उम्मीदवार के तौर पर जेडीयू ने अपने तेज-तर्रार नेता नीरज कुमार को मोकामा सीट से चुनावी मैदान में उतार दिया। नीरज कुमार के कंधों पर सत्ताधारी गठबंधन की साख बचाने की बड़ी जिम्मेदारी थी।
2015 का वह ऐतिहासिक चुनाव और बदले हुए समीकरण
मोकामा का रण केवल नीरज कुमार और अनंत सिंह तक सीमित नहीं था। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। एनडीए की ओर से लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के टिकट पर कन्हैया कुमार सिंह मैदान में उतरे थे। कन्हैया सिंह उस समय के चर्चित बाहुबली नेता सूरजभान सिंह के सगे भाई थे, जिनका चुनाव चिह्न ‘बंगला’ था। दूसरी तरफ, अनंत सिंह के पुराने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों में शुमार ललन सिंह भी इसी सीट से अपनी किस्मत आजमा रहे थे। ललन सिंह ने इस बार पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी (जाप) का दामन थामा था और वह ‘हॉकी और बॉल’ चुनाव चिह्न के साथ मैदान में डटे थे। इन सबके बीच, अनंत सिंह ने किसी दल या बड़े गठबंधन का सहारा लिए बिना निर्दलीय ही चुनावी समर में उतरने का साहसिक फैसला किया। उनका चुनाव चिह्न ‘डीजल पंप’ था। जब मोकामा सीट के चुनावी नतीजे सामने आए, तो मोकामा की जनता ने किसी भी गठबंधन के बजाय अनंत सिंह के पक्ष में एकतरफा जनादेश दिया। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उस चुनाव में अनंत सिंह को सर्वाधिक 54,005 वोट प्राप्त हुए थे, जो कुल पड़े मतों का 37.35 प्रतिशत था। उन्होंने अपने सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी नीरज कुमार को काफी पीछे छोड़ दिया था।महागठबंधन के दिग्गज प्रत्याशी होने के बावजूद नीरज कुमार को 36,557 वोट (24.66 प्रतिशत) मिले। अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच हार-जीत का यह फासला करीब 17,448 वोटों का रहा। वहीं, एनडीए के प्रत्याशी कन्हैया कुमार सिंह 15,472 वोट (10.70 प्रतिशत) लाकर तीसरे स्थान पर रहे। जन अधिकार पार्टी के ललन सिंह को 16,565 वोट मिले और वे करीब 11.52 प्रतिशत वोट के साथ तीसरे और चौथे स्थान की लड़ाई तक ही सीमित रहे। बता दें कि उस समय मोकामा विधानसभा क्षेत्र में कुल 2,53,912 पंजीकृत मतदाता थे, जिनमें से 1,44,587 लोगों ने वोट डाला था और कुल 56.94 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था।
दिग्गजों की घेरेबंदी और त्रिकोणीय मुकाबला
जब मोकामा सीट के चुनावी नतीजे सामने आए, तो मोकामा की जनता ने किसी भी गठबंधन के बजाय अनंत सिंह के पक्ष में एकतरफा जनादेश दिया। निर्वाचन आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उस चुनाव में अनंत सिंह को सर्वाधिक 54,005 वोट प्राप्त हुए थे, जो कुल पड़े मतों का 37.35 प्रतिशत था। उन्होंने अपने सबसे करीबी प्रतिद्वंद्वी नीरज कुमार को काफी पीछे छोड़ दिया था।महागठबंधन के दिग्गज प्रत्याशी होने के बावजूद नीरज कुमार को 36,557 वोट (24.66 प्रतिशत) मिले। अनंत सिंह और नीरज कुमार के बीच हार-जीत का यह फासला करीब 17,448 वोटों का रहा। वहीं, एनडीए के प्रत्याशी कन्हैया कुमार सिंह 15,472 वोट (10.70 प्रतिशत) लाकर तीसरे स्थान पर रहे। जन अधिकार पार्टी के ललन सिंह को 16,565 वोट मिले और वे करीब 11.52 प्रतिशत वोट के साथ तीसरे और चौथे स्थान की लड़ाई तक ही सीमित रहे। बता दें कि उस समय मोकामा विधानसभा क्षेत्र में कुल 2,53,912 पंजीकृत मतदाता थे, जिनमें से 1,44,587 लोगों ने वोट डाला था और कुल 56.94 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया था। 2015 का वह विधानसभा चुनाव मोकामा के इतिहास में इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि उसी वक्त नीरज कुमार और अनंत सिंह के बीच सीधी और तीखी राजनीतिक टक्कर की नींव पक्की हुई थी। महागठबंधन की ताकत और एनडीए की घेरेबंदी के बावजूद नीरज कुमार बाहुबली अनंत सिंह के विजयी रथ को नहीं रोक सके थे। आज जब भी बिहार की मौजूदा राजनीति में अनंत सिंह और नीरज कुमार एक-दूसरे के आमने-सामने दिखाई देते हैं, तो उसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए 2015 के उसी चुनाव के पन्ने पलटने पड़ते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि 11 साल पुरानी इस सियासी दुश्मनी में क्या इस बार नीरज कुमार अपना पुराना चुनावी बदला ले पाएंगे, या मोकामा की राजनीति एक बार फिर ‘छोटे सरकार’ के इर्द-गिर्द ही घूमेगी।



