
पटना। बिहार की राजनीति में युवाओं और उनके अधिकारों का मुद्दा एक बार फिर से गरमा गया है। बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) के संस्थापक मुकेश सहनी ने देश के छात्र-छात्राओं और युवाओं के खिलाफ की गई कथित अपमानजनक टिप्पणियों को लेकर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। रोजगार, शिक्षा और अपने संवैधानिक अधिकारों की मांग कर रहे युवाओं को ‘मक्खी’ और ‘कॉकरोच’ कहे जाने पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सहनी ने इसे सीधे तौर पर लोकतांत्रिक मूल्यों का चीरहरण करार दिया है। वीआईपी प्रमुख ने दो टूक कहा कि अपने हक की लड़ाई लड़ रहे युवाओं को ऐसे अमर्यादित शब्दों से संबोधित करना व्यवस्था के अहंकार को दर्शाता है।सहनी ने देश के गौरवशाली इतिहास और स्वतंत्रता संग्राम के नायकों का स्मरण करते हुए इस कृत्य की कड़ी भर्त्सना की। उन्होंने कहा कि यह वही महान देश है, जहां अमर शहीद जुब्बा सहनी, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई जैसे महान क्रांतिकारियों ने अन्याय, अत्याचार और तानाशाही के खिलाफ कड़ा संघर्ष किया था। इन वीरों ने अपने प्राणों की सर्वोच्च आहुति देकर देश को स्वतंत्रता दिलाई थी, ताकि आने वाली पीढ़ियां एक मजबूत लोकतंत्र में पूर्ण सम्मान के साथ जी सकें। आज उसी आजाद देश में हक मांगने वाले युवाओं के आत्मसम्मान को कुचला जा रहा है, जो सीधे तौर पर उन अमर शहीदों के बलिदान का अपमान है।
बिहार की सियासत में उबाल!
वीआईपी प्रमुख ने वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर चिंता जताते हुए कहा कि आज का युवा बेहद जागरूक है। जब वह शिक्षा, रोजगार, समान अवसर और संविधान की रक्षा से जुड़े तीखे सवाल पूछता है, तो सत्ता में बैठे लोग असहज हो जाते हैं। युवाओं के इन वाजिब सवालों का ठोस और सकारात्मक जवाब देने के बजाय उन्हें ‘मक्खी’ और ‘कॉकरोच’ कहकर जलील करना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए अत्यंत शर्मनाक है। उन्होंने सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि वह युवाओं को कमजोर, लाचार या असहाय समझने की भूल कतई न करे। देश का युवा वर्ग ही इस राष्ट्र की असली ताकत है और इन्हीं के मजबूत कंधों पर भविष्य के नए भारत के निर्माण की अहम जिम्मेदारी टिकी हुई है।
“ये लोकतंत्र का अपमान है…”
लोकतंत्र की वास्तविक परिभाषा पर जोर देते हुए मुकेश सहनी ने कहा कि लोकतंत्र की प्रक्रिया केवल मतदान करने और चुनाव जीतने तक सीमित नहीं रह सकती। देश के पवित्र संविधान ने हर एक नागरिक को अपनी बात मजबूती से रखने और सत्ता तंत्र से सवाल पूछने का मौलिक अधिकार प्रदान किया है। सरकार का यह परम दायित्व है कि वह युवाओं की आवाज को कुचलने या उन्हें अपमानित करने के बजाय धैर्यपूर्वक उनकी बातें सुने और समस्याओं का ठोस समाधान निकाले। सहनी ने स्पष्ट किया कि जब तक देश के युवाओं को उनका वाजिब सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक न तो लोकतंत्र की अस्मिता सुरक्षित रह सकती है और न ही संविधान की गरिमा कायम रह सकती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सहनी का यह कड़ा बयान आने वाले समय में युवाओं के बीच एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन सकता है।



