
पटना। दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ (डूसू) चुनाव 2026 में इस बार एक ऐतिहासिक उलटफेर देखने को मिला है। छात्र राजनीति में हमेशा से दबदबा रखने वाले प्रमुख संगठनों- अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) को एक निर्दलीय उम्मीदवार ने करारी मात दी है। डूसू के उपाध्यक्ष पद पर पीरागढ़ी गांव के रहने वाले दीपांशु शौकीन ने शानदार जीत दर्ज कर छात्र राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। मतगणना के 12वें राउंड तक ही 18,943 वोट हासिल कर उन्होंने अपनी अजेय बढ़त साबित कर दी थी।दीपांशु की यह जीत उनके संघर्ष और दृढ़ निश्चय की कहानी है। एक बेहद साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले दीपांशु के पिता बस कंडक्टर हैं और माता आंगनवाड़ी कार्यकर्ता हैं। शहीद भगत सिंह कॉलेज से स्नातक करने के बाद वे वर्तमान में डीयू के ‘डिपार्टमेंट ऑफ बुद्धिस्ट स्टडीज’ के छात्र हैं। इस चुनाव में उनकी उम्मीदवारी की कहानी भी खासी दिलचस्प है। शुरुआत में दीपांशु ने कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई से टिकट की मांग की थी और नामांकन भी दाखिल कर दिया था। लेकिन, ऐन वक्त पर संगठन ने उन पर नामांकन वापस लेने का भारी दबाव बनाया। संगठन के फरमान के आगे झुकने के बजाय दीपांशु ने बागी तेवर अपनाए और निर्दलीय ही चुनावी मैदान में ताल ठोंक दी। उनके इस साहसिक कदम ने विश्वविद्यालय के सारे राजनीतिक समीकरण पलट कर रख दिए।
पैर किया प्रचार, अब पहनेंगे जीत का ताज
इस अप्रत्याशित जीत में दीपांशु के जमीनी जुड़ाव और एक अनोखे संकल्प का बड़ा योगदान रहा। पूरे चुनाव प्रचार के दौरान वे तपती सड़कों पर नंगे पैर ही छात्रों के बीच वोट मांगने गए। उनका यह संकल्प सत्य निकेतन बिल्डिंग हादसे से जुड़े छात्रों को न्याय दिलाने के लिए था। दीपांशु का कहना था कि जब तक पीड़ित छात्रों को इंसाफ नहीं मिल जाता, वे पैरों में जूते-चप्पल नहीं पहनेंगे। उनका मानना था कि पैरों में चुभने वाला दर्द उन्हें उन छात्रों की पीड़ा की याद दिलाता रहेगा। उनके इस भावनात्मक और सच्चे जुड़ाव ने डीयू के हजारों छात्रों के दिलों को छू लिया।
अपनों ने दिया धोखा तो बागी होकर रचा इतिहास
जैसे ही मतगणना में उनकी जीत सुनिश्चित होने लगी, दीपांशु ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपने समर्थकों को धन्यवाद देते हुए लिखा, “इट्स डन ब्रो, थैंक यू डीयू (It’s done Bro, Thank you DU)।” बिना किसी बड़े राजनीतिक बैकग्राउंड और बिना किसी संगठन के धनबल के, एक बस कंडक्टर के बेटे का देश के सबसे बड़े छात्रसंघ चुनाव में उपाध्यक्ष बनना साबित करता है कि इरादे मजबूत हों तो कोई भी मंजिल दूर नहीं। दीपांशु की इस निर्दलीय हुंकार ने राष्ट्रीय दलों से जुड़े छात्र संगठनों को आत्ममंथन करने पर मजबूर कर दिया है।



