
बिहार की अदालतों में जमानत याचिकाओं (बेल अर्जी) के निपटारे में होने वाली अनावश्यक देरी को समाप्त करने के लिए पटना हाईकोर्ट ने एक बेहद सख्त और ऐतिहासिक कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के अनुपालन में पटना उच्च न्यायालय ने एक नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) तैयार की है। इस नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य न केवल लंबित जमानत अर्जियों का त्वरित गति से निस्तारण करना है, बल्कि पुलिस, अभियोजन पक्ष और स्वास्थ्य विभाग की जवाबदेही भी पूरी तरह से तय करना है। अब जमानत मामलों में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जाएगी। जमानत की अर्जी दाखिल होने के बाद अमूमन केस डायरी या मेडिकल रिपोर्ट समय पर उपलब्ध नहीं होने के कारण सुनवाई महीनों तक टलती रहती है। इस अड़ंगे को दूर करने के लिए नई व्यवस्था में केस डायरी को डिजिटल माध्यम से भेजने पर विशेष जोर दिया गया है। अब पुलिसकर्मियों और कोर्ट के पैरोकारों को लोक अभियोजक (पीपी) तथा सहायक लोक अभियोजक (एपीपी) के साथ केस डायरी व अन्य जरूरी दस्तावेज व्हाट्सऐप और ईमेल जैसे त्वरित डिजिटल माध्यमों से साझा करने होंगे। इस पूरी प्रक्रिया की कड़ी मॉनिटरिंग के लिए डीएसपी स्तर के अधिकारियों को नोडल पदाधिकारी नियुक्त किया जाएगा। न्यायिक प्रक्रिया को पारदर्शी और तेज बनाने के लिहाज से चोट से संबंधित रिपोर्ट, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और फॉरेंसिक दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के लिए भी सख्त समय-सीमा तय कर दी गई है। अब अस्पतालों और जांच एजेंसियों को अधिकतम पांच दिनों के भीतर ये सभी रिपोर्ट अदालत में पेश करनी होंगी। स्वास्थ्य विभाग के स्तर पर इसके लिए विशेष नोडल अधिकारियों की नियुक्ति की जाएगी ताकि चिकित्सकीय साक्ष्यों के अभाव में किसी भी विचाराधीन कैदी की जमानत सुनवाई न लटके।
30, 60 और 90 दिनों की होगी विशेष निगरानी
लंबित मामलों की सघन निगरानी के लिए अदालतों के सॉफ्टवेयर सिस्टम में बड़े बदलाव किए गए हैं। इसके तहत अब 30, 60 और 90 दिनों से लंबित जमानत मामलों की पहचान के लिए सॉफ्टवेयर में ‘रेड फ्लैग’ या विशेष चिह्न लगाने की व्यवस्था की गई है। इसमें 60 दिनों से पुराने मामलों को शीर्ष प्राथमिकता दी जाएगी और देरी के वास्तविक कारणों की अदालत द्वारा गहन समीक्षा की जाएगी। हालांकि, न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि 60 दिन की अवधि पूरी होने का अर्थ स्वतः जमानत मिलना नहीं होगा, बल्कि इसका मकसद केवल सुनवाई में तेजी लाना है। अदालतों में वकीलों द्वारा बार-बार तारीख (स्थगन) लेने की पुरानी प्रवृत्ति पर भी अब लगाम कसी जाएगी। नई एसओपी के मुताबिक, केवल बेहद असाधारण और विशेष परिस्थितियों में ही सुनवाई स्थगित की जाएगी और इसके लिए भी ठोस कारण दर्ज करना अनिवार्य होगा। यदि याचिका में कोई तकनीकी कमी है, तो उसे दूर करने के लिए अधिकतम 72 घंटे का समय दिया जाएगा। साथ ही, जमानत सुनवाई से पहले पीड़ित या शिकायतकर्ता को नोटिस भेजने और उसकी तामील की रिपोर्ट हर हाल में पांच दिनों के भीतर अदालत में प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। जिला स्तरीय बैठकों में अब जमानत से जुड़े मामलों की विस्तृत समीक्षा की जाएगी। यदि कोई पुलिसकर्मी, जांच अधिकारी (आईओ) या स्वास्थ्य कर्मी रिपोर्ट सौंपने में लापरवाही बरतता पाया गया, तो उसका मामला सीधे शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष रखा जाएगा।
जजों की भी तय हुई जिम्मेदारी
इसका सीधा अर्थ यह है कि केस डायरी या पोस्टमार्टम रिपोर्ट में जानबूझकर की गई देरी अब संबंधित अधिकारी पर भारी पड़ सकती है। इस पूरी प्रक्रिया में निचली अदालतों के न्यायाधीशों की जवाबदेही भी तय की गई है। अब उन्हें हर महीने जिला जज के समक्ष जमानत याचिकाओं की प्राप्ति और उनके निस्तारण का विस्तृत ब्योरा प्रस्तुत करना होगा। दो महीने से अधिक समय तक लंबित मामलों में देरी का स्पष्ट कारण बताना होगा। दूसरी तरफ, पटना हाईकोर्ट में जमानत याचिकाओं के भारी बोझ को कम करने के लिए सभी एकल न्यायाधीश पीठों के समक्ष प्रतिदिन पांच से दस जमानत अर्जियां अनिवार्य रूप से सूचीबद्ध करने का भी प्रावधान किया गया है। पटना हाईकोर्ट की यह नई एसओपी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा और समयबद्ध न्याय प्रणाली की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी।



