
पटना। त्योहारी सीजन के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में रेलवे कर्मचारियों के लिए बड़ा ऐलान किया गया है। सरकार ने रेलवे के नॉन-गजेटेड (अराजपत्रित) कर्मचारियों को दिवाली का तोहफा देते हुए 78 दिन के वेतन के बराबर ‘प्रोडक्टिविटी लिंक्ड बोनस’ (PLB) देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बुधवार शाम इस फैसले की आधिकारिक जानकारी दी। सरकार के इस फैसले से देश भर के लगभग 11 लाख 72 हजार रेलकर्मियों और उनके परिवारों को त्योहार पर फौरी तौर पर आर्थिक राहत मिलेगी। हालांकि, इस बड़ी घोषणा के बावजूद कर्मचारियों के बीच पूरी तरह से जश्न का माहौल नहीं है, क्योंकि बोनस की गणना का फॉर्मूला 11 साल पुराना ही रखा गया है।
7 हजार की सीलिंग, 17 हजार पर अटका बोनस
रेलवे कर्मचारियों के लिए बोनस की घोषणा हर साल दशहरा और दिवाली से पहले होती है। इस बार भी 78 दिनों का बोनस तय हुआ है, लेकिन असल पेंच इसकी गणना की सीमा (कैलकुलेशन सीलिंग) में फंसा है। मौजूदा समय में रेलवे में बोनस की गणना अधिकतम 7,000 रुपये प्रति माह के वेतन के आधार पर की जाती है। इस फॉर्मूले के हिसाब से 78 दिन के बोनस की अधिकतम राशि महज 17,951 रुपये ही बनती है। कर्मचारी संगठनों का साफ कहना है कि गणना की यह सीमा वित्त वर्ष 2014-15 से यानी पिछले 11 वर्षों से जस की तस बनी हुई है। इस दौरान महंगाई आसमान छूने लगी है, लेकिन बोनस की रकम उसी पुराने पैमाने पर स्थिर है।
न्यूनतम वेतन 18 हजार, तो बोनस की गणना 7 हजार पर क्यों?
कर्मचारी यूनियनों की लंबे समय से यह मांग रही है कि सातवें वेतन आयोग के लागू होने के बाद जब न्यूनतम वेतन बढ़कर 18,000 रुपये प्रति माह हो चुका है, तो बोनस का आकलन 7,000 रुपये पर क्यों किया जा रहा है? संगठनों का तर्क है कि यदि बोनस की गणना न्यूनतम वेतन 18,000 रुपये के आधार पर की जाए, तो 78 दिन के बोनस की वास्तविक राशि 17,951 रुपये की बजाय करीब 46,184 रुपये बैठेगी। दिन-रात 24 घंटे ट्रेनें चलाने वाले रेलकर्मियों का मानना है कि उन्हें उनके वास्तविक हक से वंचित रखा जा रहा है। रेलवे कर्मचारियों की इस मांग को राजनीतिक और सांगठनिक स्तर पर भी बल मिला है। माकपा नेता और राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास ने हाल ही में रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को एक विस्तृत पत्र लिखकर इस विसंगति की ओर ध्यान आकृष्ट कराया था। अपने पत्र में उन्होंने श्रमिक संगठन ‘सीटू’ (CITU) की मांग का प्रमुखता से हवाला देते हुए कहा था कि गणना की अधिकतम वेतन सीमा में तत्काल संशोधन किया जाए। उन्होंने महंगाई भत्ते और न्यूनतम वेतन के वर्तमान आकलन के आधार पर मासिक वेतन सीमा कम से कम 28,440 रुपये निर्धारित करने की अपील की थी।
अन्य उपक्रमों (PSUs) से तुलना पर बढ़ता असंतोष
रेलकर्मियों की नाराजगी उस वक्त और बढ़ जाती है जब वे अपने बोनस की तुलना कोल इंडिया लिमिटेड और स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) जैसे अन्य प्रमुख सार्वजनिक उपक्रमों से करते हैं। पिछले साल कोल इंडिया के कर्मचारियों को करीब 1.03 लाख रुपये और सेल के कर्मचारियों को लगभग 29,500 रुपये का भारी-भरकम बोनस मिला था। इस साल भी कोल इंडिया में लगभग 1.10 लाख रुपये और सेल में करीब 40 हजार रुपये तक का बोनस मिलने की चर्चा जोरों पर है। ऐसे में देश की जीवनरेखा कहे जाने वाले रेलवे के कर्मचारियों को मात्र 17 हजार रुपये में समेटना उनके मनोबल पर असर डालता है।निष्कर्ष के तौर पर, कैबिनेट की मंजूरी के बाद रेलकर्मियों के बैंक खातों में त्योहारी खर्चों के लिए बोनस तो जरूर आएगा, लेकिन अन्य उपक्रमों के मुकाबले कम लाभ और 11 साल पुरानी वेतन सीमा के चलते जो निराशा है, वह कर्मचारियों के बीच अभी बनी रहेगी।



