
पटना। बिहार विधान परिषद (एमएलसी) की 8 स्नातक और शिक्षक सीटों पर होने वाले आगामी चुनावों को लेकर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। 9 अक्टूबर को मुख्यमंत्री आवास पर एनडीए विधानमंडल दल की अहम बैठक हुई, जिसमें मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने ‘क्लीन स्वीप’ यानी सभी आठ सीटें जीतने का लक्ष्य निर्धारित किया। विधायकों और विधान पार्षदों को स्पष्ट संदेश दिया गया कि गठबंधन के अधिकृत उम्मीदवारों को हर हाल में विजयी बनाना है। हालांकि, एनडीए के सामने इस बार मुख्य चुनौती विपक्षी दल नहीं, बल्कि गठबंधन के भीतर उठ रहे विरोध के सुर और अपनों की बगावत है।
सख्ती और साझा प्रचार पर जोर
इस चुनाव में पटना स्नातक सीट सबसे ‘हॉट सीट’ बन गई है। इसका मुख्य कारण मोकामा के बाहुबली जदयू विधायक अनंत सिंह की खुली बगावत है। अनंत सिंह अपनी ही पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी और पूर्व मंत्री नीरज कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। वे जनसुराज समर्थित प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह के पक्ष में लगातार जनसंपर्क और रोड शो कर रहे हैं।अनंत सिंह का स्पष्ट तर्क है कि यह चुनाव किसी पार्टी का नहीं, बल्कि व्यक्ति-व्यक्ति का है। चूंकि अतीत में नीरज कुमार ने उनका विरोध किया था, इसलिए वे अब नीरज का समर्थन नहीं कर सकते। यद्यपि जदयू के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा और केंद्रीय मंत्री ललन सिंह ने इस नाराजगी को दूर करने का प्रयास किया, लेकिन बात नहीं बनी। ललन सिंह ने इसे ‘क्रिया की प्रतिक्रिया’ करार देकर प्रदेश इकाई की चूक की ओर भी इशारा किया था।चुनावी गणित की बात करें तो 2020 में नीरज कुमार को प्रथम वरीयता के 17 हजार से अधिक वोट मिले थे और उन्होंने बड़ी जीत दर्ज की थी।
सारण में रालोमो ने बढ़ाया सिरदर्द
पटना स्नातक क्षेत्र का दायरा बड़ा है और यहां प्रबुद्ध मतदाता हैं। ऐसे में अनंत सिंह कुछ क्षेत्रों में सेंधमारी जरूर कर सकते हैं, लेकिन नीरज कुमार के मजबूत संगठनात्मक ढांचे और एनडीए के कैडर वोट को पूरी तरह से भेद पाना आसान नहीं होगा। फिर भी, इस बगावत ने मुकाबले को बेहद दिलचस्प बना दिया है। एनडीए के लिए टेंशन सिर्फ पटना तक सीमित नहीं है। सारण शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भी गठबंधन के भीतर वोटों के बिखराव का भारी खतरा मंडरा रहा है। यहां जदयू ने आनंद पुष्कर को मैदान में उतारा है, लेकिन एनडीए के ही सहयोगी दल राष्ट्रीय लोक मोर्चा (रालोमो) ने उनके खिलाफ बगावत कर दी है। रालोमो के तीन विधायकों के समर्थन से पार्टी नेता रामपुकार सिन्हा चुनावी अखाड़े में उतर गए हैं। यह सीट इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि 2023 के उपचुनाव में मौजूदा एमएलसी अफाक अहमद (जनसुराज समर्थित) ने आनंद पुष्कर को मात्र 700 वोटों के मामूली अंतर से हराया था। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या सीमित होती है। ऐसे में अगर रालोमो का बागी प्रत्याशी एक-दो हजार वोट भी काट लेता है, तो इसका सीधा नुकसान जदयू को होगा और त्रिकोणीय मुकाबले में एनडीए को यह सीट गंवानी पड़ सकती है।
सख्ती और साझा प्रचार पर जोर
इन गंभीर चुनौतियों को देखते हुए एनडीए ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सख्त निर्देश दिए हैं कि सभी घटक दल अलग-अलग नहीं, बल्कि साझा प्रचार करेंगे। नेताओं को डोर-टू-डोर कैंपेन और माइक्रो-मैनेजमेंट का जिम्मा सौंपा गया है। बैठक में यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि बागी उम्मीदवारों और भीतरघात करने वाले नेताओं पर पार्टी स्तर से कड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाएगी।अब देखना यह है कि एनडीए का शीर्ष नेतृत्व अपनी इस सख्ती और साझा रणनीति से अपनों की बगावत को कुचलने में सफल होता है, या फिर यह भीतरी कलह ‘मिशन 8’ के लक्ष्य को भेदने में विपक्ष का काम आसान कर देगी।



