हर युवा का सपना होता है कि वह अपने घर-परिवार के करीब रहकर रोजगार करें और अपनी मेहनत से अच्छी आमदनी कमाए। अपनी मिट्टी से जुड़े रहकर आजीविका कमाने से आर्थिक मजबूती के साथ-साथ परिवार के साथ रहने का सुख और आत्मनिर्भरता का भरोसा भी बढ़ता है। युवाओं की इसी सोच को धरातल पर उतारने और रोजगार के लिए होने वाले पलायन को कम करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार लगातार प्रयास कर रही हैं।
बिहार में युवाओं के लिए पशुपालन और मुर्गी पालन ऐसे व्यवसाय हैं, जिन्हें सीमित संसाधनों के साथ भी शुरू किया जा रहा है। इन व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए सरकार की ओर से अलग-अलग योजनाओं के माध्यम से सहायता और सब्सिडी का प्रावधान भी किया जाता है। इसमें बिहार समग्र गव्य विकास योजना (डेयरी), एकीकृत पोल्ट्री/मुर्गी विकास योजना और राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) प्रमुख है।
पशुपालन और मुर्गी पालन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें गांव और घर के आसपास रहकर किया जा सकता है। इससे युवाओं को रोजगार के लिए दूसरे शहरों की ओर जाने की मजबूरी कम करने में मदद मिल सकती है। सही प्रशिक्षण, बाजार की जानकारी और सरकारी योजनाओं का लाभ मिले, तो पशुपालन और मुर्गी पालन ग्रामीण परिवारों के लिए आय और रोजगार का महत्वपूर्ण साधन बन सकते हैं। यानी, गांव में रहकर अपने संसाधनों और मेहनत के दम पर रोजगार खड़ा करने की राह अब युवाओं के लिए और आसान हो सकती है।
आत्मा’ योजना से हौसले को उड़ान

इसी कड़ी में कहानी आज शेखपुरा के चंदन कुमार की,जिन्होंने ‘आत्मा’ योजना के तहत मुर्गी पालन का प्रशिक्षण प्राप्त किया। प्रशिक्षण के दौरान मिली तकनीकी जानकारी और विशेषज्ञों के मार्गदर्शन ने उन्हें मुर्गी पालन को व्यवसाय के रूप में अपनाने का हौसला दिया। प्रशिक्षण के बाद चंदन कुमार ने मुर्गी पालन का अपना व्यवसाय शुरू किया। वैज्ञानिक तरीकों, बेहतर प्रबंधन और प्रशिक्षण से मिली जानकारी को अपनाकर उन्होंने धीरे-धीरे अपने कारोबार का विस्तार किया। आज मुर्गी पालन उनके लिए सिर्फ रोजगार का जरिया नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और आर्थिक मजबूती का माध्यम बन चुका है।
चंदन कुमार बताते हैं कि, “मैं मुर्गी पालन का प्रशिक्षण आत्मा, शेखपुरा से लिया। इसके बाद उन्होंने अपना कारोबार शुरू किया। मुर्गी के बच्चे लाने के बाद करीब 25 दिनों में उनका वजन 1 किलो 200 से 250 ग्राम तक हो जाता है। इससे उन्हें अच्छी आमदनी होती है। इस काम से वह और उनका परिवार काफी खुश हैं और उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं है।”
“मुर्गियों को तैयार होने के बाद उन्हें बाजार में बेचते हैं। अगर वह सीधे बाजार में बिक्री करते हैं तो उन्हें ज्यादा आमदनी होती है। मुर्गियां लगभग 130 रुपए प्रति किलो की दर से बिक जाती हैं। वहीं, डीलर के माध्यम से बेचने पर उन्हें 115 से 110 रुपए प्रति किलो तक कीमत मिलती है।” आगे चंदन कुमार बताते हैं।
गौरतलब है कि बिहार में ‘आत्मा’ (ATMA – Agricultural Technology Management Agency / कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंधन अभिकरण) योजना जिला और प्रखंड स्तर पर कृषि तकनीक, प्रशिक्षण और अनुसंधान का प्रसार करने वाली एक स्वायत्त संस्था है। इसके तहत किसानों को फसल प्रबंधन, बागवानी, पशुपालन और कौशल विकास के लिए निःशुल्क प्रशिक्षण दिया जाता है।
इस तरह सही प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी के साथ मुर्गी पालन ग्रामीण युवाओं के लिए रोजगार का बेहतर विकल्प बन सकता है। चंदन कुमार की कहानी बताती है कि गांव में उपलब्ध संसाधनों और मेहनत के जरिए भी अपना कारोबार खड़ा किया जा सकता है। सरकारी योजनाओं, प्रशिक्षण और बाजार की सही जानकारी का लाभ युवाओं को स्थानीय स्तर पर रोजगार शुरू करने में मदद कर सकता है।



