
पटना। बिहार की सियासत में विधानसभा चुनाव से पहले विधान परिषद के चुनावों ने सरगर्मी काफी बढ़ा दी है। विशेषकर पटना स्नातक विधान परिषद (एमएलसी) निर्वाचन क्षेत्र का मुकाबला हर दिन एक नया और दिलचस्प मोड़ ले रहा है। इस चुनाव में सबसे बड़ा सियासी उलटफेर तब देखने को मिला, जब जनसुराज के नेता और मोकामा से विधानसभा चुनाव लड़ चुके पीयूष प्रियदर्शी ने अपनी ही पार्टी के घोषित प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पीयूष ने अपनी पार्टी से बगावत करते हुए जदयू (JDU) प्रत्याशी नीरज कुमार के समर्थन का खुला ऐलान किया है। इस पूरे सियासी ड्रामे के केंद्र में मोकामा के पूर्व विधायक और बाहुबली नेता अनंत सिंह हैं। दिलचस्प बात यह है कि अनंत सिंह खुद जदयू से जुड़े हैं, लेकिन वे अपनी ही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार नीरज कुमार के बजाय जनसुराज प्रत्याशी डॉ. अनुज सिंह के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं। जदयू प्रत्याशी नीरज कुमार और अनंत सिंह के बीच की पुरानी राजनीतिक अदावत जगजाहिर है। अनंत सिंह के इसी दांव ने उनके पुराने प्रतिद्वंद्वी पीयूष प्रियदर्शी को बगावत करने पर मजबूर कर दिया है।
पीयूष की दलील: ‘बाहुबल से नहीं चलेगा शिक्षित समाज’
पीयूष प्रियदर्शी और अनंत सिंह एक-दूसरे के धुर राजनीतिक विरोधी रहे हैं। मोकामा विधानसभा चुनाव में पीयूष ने अनंत सिंह के खिलाफ जनसुराज के टिकट पर चुनावी ताल ठोंकी थी। इस दौरान दोनों गुटों में भारी टकराव देखने को मिला था। पीयूष ने दुलारचंद यादव हत्याकांड और अपने सैकड़ों कार्यकर्ताओं पर दर्ज हुए मुकदमों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया है कि वे अपनी नैतिक प्रतिबद्धताओं से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं कर सकते। उनका कड़ा तर्क है कि स्नातक निर्वाचन क्षेत्र शिक्षित युवाओं और बुद्धिजीवियों का प्रतिनिधित्व करता है; ऐसे में बाहुबल और अपराध की पृष्ठभूमि वाले समीकरणों के सहारे चुनाव लड़ना लोकतांत्रिक मूल्यों के पूरी तरह खिलाफ है। पटना स्नातक विधान परिषद सीट का भौगोलिक दायरा काफी बड़ा है। इसमें पटना, नालंदा और नवादा जिलों के कुल 26 विधानसभा क्षेत्र शामिल हैं। इस बार चुनाव में करीब 88 हजार पंजीकृत स्नातक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह चुनाव अब केवल एक एमएलसी सीट जीतने तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह स्थानीय राजनीतिक वर्चस्व की अग्निपरीक्षा बन गया है। जदयू आलाकमान और पार्टी के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा भी इस क्रॉस-समीकरण और बगावत वाले घटनाक्रम पर पैनी नजर बनाए हुए हैं।
निर्णायक साबित होंगे जातीय समीकरण
स्नातक चुनाव में सैद्धांतिक रूप से वोट जातियों में नहीं बंटते, लेकिन इस बार उम्मीदवार जातीय गोलबंदी को साधने में पूरी ताकत झोंक रहे हैं। राजनीतिक जानकारों के आकलन के अनुसार, इस निर्वाचन क्षेत्र में पिछड़ा और अति पिछड़ा वर्ग के करीब 25 हजार मतदाता हैं। इसके अलावा लव-कुश समीकरण के लगभग 15 हजार और भूमिहार समाज के करीब 15 हजार मतदाता जीत-हार तय करने में बड़ी भूमिका निभाएंगे। ब्राह्मण, राजपूत (लगभग 10 हजार) और दलित मतदाताओं को भी अपने पाले में करने की राजनीतिक कवायद तेज है।कागजों पर मुकाबला भले ही त्रिकोणीय (जदयू, जनसुराज और राजद) हो, लेकिन अनंत सिंह और पीयूष प्रियदर्शी के आर-पार के रुख ने पूरी लड़ाई को व्यक्तिगत प्रतिष्ठा के टकराव में बदल दिया है। मोकामा की यह पुरानी राजनीतिक दुश्मनी अब पटना स्नातक चुनाव में क्या गुल खिलाती है, यह परिणाम ही तय करेगा।



