
गया। नेपाल में आई भीषण प्राकृतिक आपदा का गहरा साया अब विश्व प्रसिद्ध पितृपक्ष मेला क्षेत्र गयाजी में भी साफ तौर पर दिखने लगा है। पितरों की मोक्ष प्राप्ति और आत्मा की शांति के लिए गया धाम पहुंचे नेपाली तीर्थयात्री एक तरफ धार्मिक अनुष्ठान और पिंडदान में जुटे हैं, तो दूसरी तरफ उनका मन और मस्तिष्क नेपाल में छूटे अपने परिजनों की सलामती को लेकर लगातार आशंकित और बेचैन है। पोखरा सहित नेपाल के कई हिस्सों में बाढ़ और भूस्खलन जैसी त्रासदियों के बीच बड़ी संख्या में लोगों के लापता होने की खबरों ने यहां आए तीर्थयात्रियों की नींद उड़ा दी है। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई जगहों पर आपदा में जान गंवाने वाले शवों की शिनाख्त के लिए डीएनए जांच तक का सहारा लेना पड़ रहा है।गयाजी पहुंचे नेपाली तीर्थयात्रियों का दर्द साझा करते हुए कहना है कि आपदा के बाद से कई परिवारों का अपनों से संपर्क पूरी तरह टूट चुका है। नेपाल के कई प्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल नेटवर्क और संचार व्यवस्था चरमरा जाने के कारण स्वजनों का कुशलक्षेम न मिल पाना तीर्थयात्रियों की मानसिक पीड़ा को और बढ़ा रहा है। वेदों और शास्त्रों के विधान के अनुसार वे गयाजी की वेदियों पर अपने पूर्वजों का पिंडदान तो कर रहे हैं, लेकिन उनकी निगाहें और कान लगातार नेपाल से आने वाली हर एक खबर पर टिकी हुई हैं।
पितृपक्ष मेले और स्थानीय कारोबार पर संकट के बादल
इस हृदयविदारक त्रासदी का असर गयाजी के पितृपक्ष मेले और स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता दिख रहा है। सामान्य वर्षों में नेपाल से लगभग 40 से 50 हजार तीर्थयात्री पिंडदान के लिए गयाजी पहुंचते हैं, लेकिन इस बार आपदा के कारण यात्रियों की संख्या में भारी गिरावट आने की आशंका जताई जा रही है।इस संभावित मंदी ने स्थानीय कारोबारियों और पंडा समाज की चिंता बढ़ा दी है। नेपाली धर्मशाला के आसपास पूजा सामग्री, फूल-माला, वस्त्र और मिठाइयां बेचने वाले छोटे दुकानदारों के साथ-साथ गयापाल पंडों का कहना है कि नेपाल के तीर्थयात्रियों के आगमन में कमी आने से उनके व्यापार पर सीधा असर पड़ेगा। एक तरफ अपनों की सलामती की अनिश्चितता और दूसरी तरफ आजीविका पर मंडराता संकट—यह दौरा नेपाली तीर्थयात्रियों और स्थानीय कारोबारियों दोनों के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।



