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बांकीपुर का महासंग्राम: जिस सीट ने दिए मुख्यमंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष, वहां प्रशांत किशोर या BJP… किसका सजेगा ताज?

पटना । बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जीत दर्ज करने वाले नितिन नवीन के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने और राज्यसभा जाने के बाद, पटना की हाई-प्रोफाइल बांकीपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव की सरगर्मियां अब अपने चरम पर हैं। 30 जुलाई को मतदान की प्रक्रिया शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो चुकी है और अब सभी की निगाहें 3 अगस्त को होने वाली मतगणना पर टिक गई हैं। इस बार का चुनाव महज एक सीट का नहीं, बल्कि कई दिग्गजों की साख का सवाल बन गया है।इस बार बांकीपुर सीट पर मुकाबला पूरी तरह से त्रिकोणीय और कांटे का हो गया है। एक तरफ भाजपा ने अपने अजेय किले और नितिन नवीन की विरासत को बचाने के लिए नीरज कुमार सिन्हा पर दांव लगाया है, तो वहीं दूसरी ओर राजद से रेखा गुप्ता भाजपा के वोट बैंक में सेंधमारी करने के लिए मजबूत चुनौती पेश कर रही हैं। इन सबके बीच इस चुनाव को सबसे ज्यादा हाई-वोल्टेज और दिलचस्प जन सुराज के प्रशांत किशोर ने बना दिया है, जो खुद चुनावी मैदान में उतरकर अपनी राजनीतिक साख की परीक्षा दे रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों की मानें तो बांकीपुर, जिसे परिसीमन से पूर्व पटना पश्चिम के नाम से जाना जाता था, सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह बड़े नेताओं को गढ़ने वाली एक राजनीतिक प्रयोगशाला रही है। यहां के मतदाताओं ने जब भी जनादेश दिया है, उसने राज्य की राजनीति की दिशा तय की है। इतिहास गवाह है कि साल 1962 में इसी सीट से चुनाव जीतकर केबी सहाय ने बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली थी। इसके बाद 1967 में राज्य में पहली बार बनी गैर-कांग्रेसी सरकार के मुख्यमंत्री महामाया प्रसाद ने भी इसी ऐतिहासिक सीट से जीत का परचम लहराया था। साल 1977 में जनता पार्टी की लहर के दौरान बिहार में भाजपा के संस्थापक स्तंभों में शुमार ठाकुर प्रसाद (वर्तमान सांसद रविशंकर प्रसाद के पिता) ने यहीं से चुनाव जीता था।साल 1995 में इस सीट से भाजपा के नवीन सिन्हा ने जीत दर्ज की और तब से यह क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी का अभेद्य दुर्ग बन गया। साल 2006 से नवीन सिन्हा के बाद उनके पुत्र नितिन नवीन ने कमान संभाली और लगातार जीत दर्ज करते हुए राज्य सरकार में कई बार मंत्री पद भी सुशोभित किया। बांकीपुर के राजनीतिक कद को राष्ट्रीय स्तर पर तब नई ऊंचाइयां मिलीं, जब नितिन नवीन महज 45 वर्ष की उम्र में भाजपा के सबसे युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष बने।

दिलचस्प बात यह भी है कि भारतीय जनता पार्टी की कुल आयु के बराबर ही उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष की उम्र होना अपने आप में एक अनोखा सियासी रिकॉर्ड है।ऐतिहासिक रूप से यह साबित हो चुका है कि बांकीपुर की सरजमीं पर जो नेता अपनी सियासी जमीन मजबूत करते हैं, वे राजनीति के पन्नों में नया अध्याय जोड़ते हैं। ऐसे में अब पूरे राज्य को 3 अगस्त का बेसब्री से इंतजार है, जब ईवीएम खुलेंगे और यह स्पष्ट होगा कि बांकीपुर की जनता किसे अपना सिरमौर बनाकर नया इतिहास रचती है और किसे इस सियासी अखाड़े में करारी पटखनी का सामना करना पड़ता है।

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