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वैभव सूर्यवंशी के बाद अब मोतिहारी की बेटी अक्षरा गुप्ता ने रचा इतिहास

बिना स्टेडियम, बिना बड़ी सुविधा के मोतिहारी की बेटी ने हिलाया देश! रक्सौल की अक्षरा गुप्ता ने ठोका ऐतिहासिक तिहरा शतक, चाचा ने घर में नेट लगाकर दी थी ट्रेनिंग!”प्रतिभा किसी साधन की मोहताज नहीं होती और जब हौसले बुलंद हों, तो सीमावर्ती इलाक़े की बेटियां भी इतिहास रच देती हैं! जी हां, भागलपुर के मैदान पर 126 गेंदों में नाबाद 306 रन ठोकने वाली अक्षरा गुप्ता की इस कामयाबी के पीछे की कहानी आपके रोंगटे खड़े कर देगी। खेल के लिए जिस बेटी की बोर्ड परीक्षा तक छूट गई, आज उसने पूरे देश में पूर्वी चंपारण का डंका बजा दिया है!” बिहार के लाल वैभव सूर्यवंशी आज अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट और आईपीएल में अपना जलवा बिखेर रहे हैं, लेकिन अब इसी कड़ी में हमारे अपने ज़िले पूर्वी चंपारण की एक बेटी ने वो कर दिखाया है जो आज तक भारतीय महिला घरेलू क्रिकेट में विरले ही देखने को मिला है।हम बात कर रहे हैं भारत-नेपाल सीमा से सटे रक्सौल के वार्ड नंबर 4, डंकन रोड सुंदरपुर मोहल्ला की रहने वाली 15 वर्षीय अक्षरा गुप्ता की! जिन्होंने बिहार क्रिकेट एसोसिएशन की महिला अंडर-19 वनडे ट्रॉफी में नाबाद 306 रनों की ऐतिहासिक पारी खेली है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस 306 रन के पीछे कितनी बड़ी तपस्या छिपी है? आइए आपको बताते हैं अक्षरा के इस संघर्ष की पूरी कहानी।अक्षरा को क्रिकेट का शौक बचपन से था। उनके पिता राज किशोर साह और दादा फागु साह ने बेटी के सपनों को कभी मरने नहीं दिया। जब रक्सौल में कोई आधुनिक स्टेडियम या पेशेवर एकेडमी नहीं थी, तब अक्षरा के चाचा रामकृपा गुप्ता—जो खुद एक स्थानीय क्रिकेटर रहे हैं—उन्होंने महज़ 6 साल की उम्र में अक्षरा के हाथ में बल्ला थमाया और घर में ही नेट लगाकर ट्रेनिंग शुरू कर दी। माता रीना देवी और दादी मीना देवी के संबल ने अक्षरा को मैदान पर डटे रहने की ताकत दी।इसी कड़े अभ्यास का नतीजा था कि साल 2024 में बिहार क्रिकेट एसोसिएशन ने अक्षरा की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें बिहार अंडर-19 टीम का उपकप्तान बना दिया। साल 2024 से लेकर 2026 तक बीसीसीआई की तमाम टी-20 और वनडे प्रतियोगिताओं में उन्होंने बिहार का प्रतिनिधित्व किया। और अब, भागलपुर के सैंडिस कंपाउंड मैदान पर उन्होंने सिर्फ 126 गेंदों में 55 चौके और 8 छक्के जड़कर नाबाद 306 रनों की वो पारी खेली, जिसने उन्हें देश की सबसे उभरती हुई महिला क्रिकेटर बना दिया है।लेकिन दर्शकों, इस कामयाबी की एक दूसरी कड़वी सच्चाई भी है। क्रिकेट के प्रति दीवानगी और भुवनेश्वर में आयोजित अंडर-19 नेशनल टूर्नामेंट में खेलने के कारण अक्षरा इस साल अपनी दसवीं की बोर्ड परीक्षा में शामिल नहीं हो सकीं। खेल के मैदान ने उनकी परीक्षा तो छुड़वा दी, लेकिन उन्होंने देश के सामने अपनी प्रतिभा की परीक्षा पास कर ली है।इसके साथ ही अक्षरा की सफलता रक्सौल और पूरे चंपारण में खेल सुविधाओं के अभाव पर एक बड़ा सवालिया निशान खड़ी करती है। सीमावर्ती शहर रक्सौल में आज तक एक आधुनिक स्टेडियम नहीं बन सका। वर्षों से रेलवे हाईस्कूल मैदान को स्टेडियम के रूप में विकसित करने की योजना फाइलों में दबी पड़ी है। बिना किसी सरकारी आधुनिक सुविधा और बिना किसी बड़े कोच के, सिर्फ अपने घर के आंगन में नेट लगाकर एक बेटी नेशनल लेवल पर उपकप्तान बनती है और तिहरा शतक ठोकती है, यह व्यवस्था के मुंह पर एक करारा तमाचा भी है और अक्षरा के अटूट समर्पण का प्रमाण भी।अक्षरा गुप्ता की यह कामयाबी साबित करती है कि अगर चंपारण की बेटियों को परिवार का साथ मिले, तो वो दुनिया बदल सकती हैं। आज अक्षरा सीमावर्ती इलाकों की हज़ारों लड़कियों के लिए एक रोल मॉडल बन चुकी हैं। पूरी टीम की तरफ से रक्सौल की इस शेरनी अक्षरा गुप्ता और उनके पूरे परिवार को इस ऐतिहासिक कीर्तिमान के लिए बहुत-बहुत बधाई! हमें उम्मीद है कि जल्द ही अक्षरा टीम इंडिया की नीली जर्सी में देश का नाम रोशन करेंगी।

Motihari News

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