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देवापुर संगम घाट पर बदइंतज़ामी: राज्यस्तरीय मेले में कांवरियों की फजीहत, महिलाओं की निजता से खिलवाड़

मोतिहारी । जिले के पताही प्रखंड क्षेत्र स्थित ऐतिहासिक देवापुर-बेलवा संगम घाट पर प्रशासनिक उदासीनता और लापरवाही की बेहद शर्मनाक तस्वीर सामने आई है। इस घाट को ‘राज्यस्तरीय मेले’ का दर्जा मिले हुए तीन साल का लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन श्रद्धालुओं के लिए बुनियादी सुविधाओं का यहाँ भारी अकाल है। 18 तारीख से ही यहाँ जलबोझी के लिए लाखों की संख्या में भक्तों और कांवरियों का तांता लगा हुआ है। दूर-दराज से श्रद्धालु पवित्र जल उठाने पहुँच रहे हैं, लेकिन प्रशासन की आधी-अधूरी व्यवस्था ने उनकी आस्था की राह को बेहद कष्टदायी बना दिया है।

पेयजल के नाम पर सिर्फ भ्रष्टाचार का पाइप

ग्राउंड जीरो पर जब स्थिति का जायजा लिया गया, तो विकास और तैयारियों के बड़े-बड़े दावों की कलई पूरी तरह खुल गई। भीड़ के बीच शुद्ध पेयजल सबसे बड़ी जरूरत होती है, लेकिन घाट के आस-पास पेयजल उपलब्ध कराने के नाम पर सिर्फ टेंडर की खानापूर्ति की गई है। बालू और मिट्टी के बीच आनन-फानन में कंक्रीट का चबूतरा तो ढाल दिया गया, लेकिन उसके बीच से सिर्फ एक नंगा पाइप बाहर झांक रहा है। हैरानी की बात यह है कि वहाँ चापाकल (हैंडपंप) का नामोनिशान तक नहीं है। दूर-दराज से आए प्यासे श्रद्धालु पानी की एक-एक बूंद के लिए भटकने को विवश हैं।

झाड़ियों के बीच शौचालय, महिलाओं की निजता तार-तार

सबसे ज्यादा चौंकाने वाली और दर्दनाक स्थिति महिलाओं की सुविधाओं को लेकर है। राज्यस्तरीय मेले के खोखले दावों के बीच महिलाओं की गरिमा का सरेआम मजाक उड़ाया गया है। खुले मैदान में, ऊंची-ऊंची झाड़ियों के बीच जमीन पर सीधे शौचालय के पैन (सीट) धंसा दिए गए हैं। इनके चारों तरफ न तो कोई दीवार बनाई गई है, न कोई टेंट है और न ही पर्दे की कोई व्यवस्था है। स्नान के बाद महिलाओं के लिए चेंजिंग रूम तक का इंतजाम नहीं है। खुले में शौच और कपड़े बदलने की यह मजबूरी पूरे सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है।

पेड़ों के नीचे रात गुजारने को मजबूर कांवरिए

मेले में ठहरने की व्यवस्था का भी बुरा हाल है। घाट पर एक भी स्थायी धर्मशाला या शेड का निर्माण नहीं हो सका है। नतीजतन, मीलों की थका देने वाली यात्रा कर पहुंचे कांवरिए सड़क किनारे, अपने वाहनों के पास या पेड़ों के नीचे खुले आसमान तले रात गुजारने को मजबूर हैं। विडंबना यह है कि जिलाधिकारी (डीएम) द्वारा खुद इस घाट का दौरा कर अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद दोपहर 12 बजे तक भी काम अधूरा पड़ा था। ऐसे में यह सवाल उठना लाजमी है कि जब 18 तारीख से जलबोझी शुरू होनी थी, तो व्यवस्थाएं पहले से मुकम्मल क्यों नहीं की गईं? क्या आस्था के इस महापर्व को भी ठेकेदारों और अधिकारियों ने महज कमीशन और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ा दिया है? प्रशासन की इस लापरवाही का जवाब कौन देगा, यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न बना हुआ है।

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