
पटना । मार्च 2026 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के इस्तीफे के ऐलान और सूबे में संभावित सियासी उलटफेर के बीच, बिहार में शराबबंदी खत्म होने की चर्चाओं ने एक बार फिर जोर पकड़ लिया है। भाजपा नेता सम्राट चौधरी के हाथों में सत्ता की कमान जाने की अटकलों के बीच यह सवाल उठने लगा है कि क्या नई सरकार शराबबंदी के फैसले को पलट देगी। हालांकि, सम्राट चौधरी फिलहाल शराबबंदी लागू रखने पर अडिग दिख रहे हैं, लेकिन नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (NCAER) की एक हालिया रिपोर्ट ने सरकार की मुश्किलें बढ़ा दी हैं और इस कानून की समीक्षा को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।’इंडिया पॉलिसी फोरम’ में पिछले सप्ताह पेश की गई NCAER की इस रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में शराबबंदी जारी रहने से राज्य के खजाने को हर साल बड़ी मात्रा में राजस्व का भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। अर्थशास्त्री रत्ना सहाय के नेतृत्व में तैयार इस रिपोर्ट में यह अनुमान जताया गया है कि यदि शराबबंदी हटाकर शराब की बिक्री को नियंत्रित किया जाए और उस पर आबकारी कर (एक्साइज टैक्स) लगाया जाए, तो राज्य के राजस्व में 14 से 15 फीसदी तक की भारी बढ़ोतरी हो सकती है। मौजूदा समय में बिहार सरकार का सालाना राजस्व करीब 65 हजार करोड़ रुपये है, ऐसे में यह संभावित बढ़ोतरी राज्य के विकास को एक नई रफ्तार दे सकती है।आर्थिक नुकसान के साथ-साथ यह रिपोर्ट शराबबंदी के मूल उद्देश्यों की सफलता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। अप्रैल 2016 में महिलाओं के खिलाफ अपराध और घरेलू हिंसा रोकने के लिए लागू किया गया यह फैसला अपने लक्ष्यों को पूरी तरह हासिल करने में विफल रहा है। रिपोर्ट के निष्कर्ष बताते हैं कि कानूनी रूप से शराब की बिक्री बंद होने के बाद राज्य में अवैध शराब के कारोबार, तस्करी, और जहरीली व मिलावटी शराब से होने वाली मौतों जैसी नई और गंभीर चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। इसके अलावा, शराब की अनुपलब्धता के कारण युवाओं में अन्य खतरनाक नशीले पदार्थों का चलन भी बढ़ा है।
प्रशासनिक मोर्चे पर भी इसके नुकसान स्पष्ट दिख रहे हैं। पुलिस और कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियों का एक बड़ा हिस्सा और संसाधन अवैध शराब पकड़ने में लगा हुआ है, जिससे व्यवस्था पर भारी दबाव पड़ रहा है। रिपोर्ट की स्पष्ट सिफारिश है कि बिहार को पूर्ण प्रतिबंध की जगह नियंत्रित शराब बिक्री और आबकारी कर व्यवस्था की ओर लौटना चाहिए, ताकि इन कीमती संसाधनों और अतिरिक्त धन का उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे और रोजगार जैसे प्राथमिक क्षेत्रों में किया जा सके।अध्ययन के अनुसार, 2005 के बाद से बिहार की औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर 7.3 फीसदी रही है, जो राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। इसके बावजूद आमदनी की कमी के कारण यह राज्य आज भी देश का सबसे गरीब सूबा बना हुआ है। अब नई सरकार के सामने आर्थिक लाभ, कानून-व्यवस्था, सामाजिक प्रभाव और राजनीतिक संवेदनशीलता के बीच एक सटीक संतुलन साधने की बड़ी चुनौती है। फिलहाल शराबबंदी हटाने को लेकर सरकार की ओर से कोई आधिकारिक फैसला सामने नहीं आया है, लेकिन सूबे के सियासी गलियारों में यह मुद्दा पूरी तरह से गरमा गया है।



