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लल्लू मुखिया की उम्मीदों पर हाईकोर्ट ने फेरा पानी: BCCA के तहत कार्रवाई पर मुहर, जेल में ही कटेंगी रातें

पटना। बिहार कंट्रोल ऑफ क्राइम्स एक्ट (BCCA), 2024 के तहत निवारक हिरासत (Preventive Detention) का सामना कर रहे कर्णवीर सिंह यादव उर्फ लल्लू मुखिया को पटना हाईकोर्ट से करारा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने उनकी आपराधिक रिट याचिका को खारिज करते हुए राज्य सरकार द्वारा जारी निरोध आदेश को बरकरार रखा है।न्यायाधीश बिबेक चौधरी और न्यायाधीश राणा विक्रम सिंह की खंडपीठ ने 74 पन्नों का विस्तृत फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि जिलाधिकारी द्वारा पारित आदेश में कोई भी ऐसा क्षेत्राधिकार संबंधी दोष, प्रक्रियात्मक अवैधता या संवैधानिक खामी नहीं है, जिसके आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप किया जाए।गौरतलब है कि बाढ़ के अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी (SDPO) ने 5 दिसंबर 2025 को कर्णवीर सिंह यादव के खिलाफ BCCA के तहत सख्त कार्रवाई की अनुशंसा की थी। इसी आधार पर पटना के जिलाधिकारी ने 10 दिसंबर 2025 को BCCA केस संख्या 1-09/2025 में अधिनियम की धारा 12(2) के तहत निरोध आदेश पारित किया था। इसके बाद लल्लू मुखिया को भागलपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। राज्य सरकार ने सलाहकार बोर्ड की राय के बाद 11 दिसंबर 2025 से 10 जून 2026 तक उनकी हिरासत की पुष्टि की थी।सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि जिन घटनाओं को हिरासत का आधार बनाया गया है, वे केवल सामान्य ‘कानून-व्यवस्था’ का हिस्सा हैं और इनसे ‘सार्वजनिक व्यवस्था’ (Public Order) को कोई खतरा नहीं है।

इसलिए, सामान्य आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती थी।वहीं, राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता एसडी संजय ने इसका पुरजोर विरोध करते हुए कहा कि याचिकाकर्ता की आपराधिक गतिविधियों के कारण स्थानीय लोगों में भारी भय और असुरक्षा का माहौल है, जिससे जनजीवन प्रभावित हुआ है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि नया आदेश पुराने आदेश की महज पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि यह नए और स्वतंत्र तथ्यों तथा अतिरिक्त आरोप-पत्रों पर आधारित है।दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भी निरोध आदेश की वैधता उस समय उपलब्ध सामग्री और सक्षम प्राधिकारी की वैधानिक संतुष्टि के आधार पर तय होती है। अदालत ने साफ किया कि अगर कोई बाद का निरोध आदेश नए और प्रासंगिक तथ्यों पर स्वतंत्र विचार करने के बाद जारी किया जाता है, तो उसे केवल इस वजह से अवैध नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि पहले भी ऐसा कोई आदेश जारी किया गया था। इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने लल्लू मुखिया की याचिका को खारिज कर दिया और हिरासत के आदेश को वैध माना।

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