
पटना। बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। बिना विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य बने छह महीने से अधिक समय तक मंत्री पद पर काबिज रहने के मामले में सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद पंचायती राज मंत्री दीपक प्रकाश का इस्तीफा लगभग तय माना जा रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश के वरिष्ठ भाजपा नेता और मंत्री दिलीप जायसवाल ने स्पष्ट कर दिया है कि सरकार हमेशा संविधान के दायरे में रहकर काम करती है और शीर्ष अदालत का जो भी फैसला आएगा, उसका अक्षरशः पालन किया जाएगा। उनके इस बयान को दीपक प्रकाश के संभावित इस्तीफे के स्पष्ट संकेत के रूप में देखा जा रहा है।दरअसल, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (RLM) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक प्रकाश को बिना किसी सदन की सदस्यता के मंत्री बनाए रखने पर यह पूरा विवाद उपजा है। वर्ष 2025 के विधानसभा चुनाव के बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें पंचायती राज मंत्री बनाया था।
बाद में सत्ता परिवर्तन के बाद जब सम्राट चौधरी के नेतृत्व में नई सरकार बनी, तब भी दीपक प्रकाश को फिर से उसी विभाग की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इन दोनों कार्यकालों को मिलाकर छह महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन वे अब तक न तो विधायक बन पाए हैं और न ही विधान पार्षद।इस मामले को लेकर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने बिहार सरकार से कड़े शब्दों में जवाब तलब किया है। अदालत ने इसे संविधान से जुड़ा एक बेहद गंभीर सवाल करार देते हुए पूछा कि जब दीपक प्रकाश अब तक किसी भी सदन के सदस्य नहीं बने हैं, तो उन्हें इतने लंबे समय तक मंत्री पद पर किस संवैधानिक आधार पर बनाए रखा गया है।
गौरतलब है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164(4) के तहत यदि कोई व्यक्ति बिना किसी सदन का सदस्य रहे मंत्री पद की शपथ लेता है, तो उसे अधिकतम छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य चुना जाना अनिवार्य होता है, अन्यथा उसे अपने पद से इस्तीफा देना पड़ता है।सुप्रीम कोर्ट की इस फटकार के बाद बिहार सरकार बैकफुट पर नजर आ रही है। सरकार का मजबूती से पक्ष रखते हुए मंत्री दिलीप जायसवाल ने कहा कि यह मामला फिलहाल संवैधानिक पीठ के समक्ष विचाराधीन है और यदि सुप्रीम कोर्ट कोई निर्देश देता है, तो बिहार सरकार तत्काल उसके अनुरूप कार्रवाई करेगी। राज्य सरकार की ओर से अदालत को भी यह आश्वस्त किया गया है कि आगामी 27 अगस्त को होने वाली सुनवाई में जो भी निर्देश मिलेगा, उसका पूर्ण रूप से पालन होगा। अब पूरे बिहार के राजनीतिक गलियारों की नजरें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिक गई हैं, जो इस तरह की संवैधानिक नियुक्तियों के लिए एक बड़ी नजीर बन सकता है।



