
पटना। बिहार पुलिस में सिपाही भर्ती की आस लगाए बैठे और पुरानी छोटी-मोटी एफआईआर के कारण नौकरी से हाथ धो चुके हजारों युवाओं के लिए पटना हाईकोर्ट ने एक बेहद ही ऐतिहासिक और राहत भरा फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में अपनी महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि युवावस्था में की गई किसी भी नादानी के लिए किसी भी व्यक्ति पर जीवन भर अपराधी होने का ठप्पा नहीं लगाया जा सकता है। उसे इस आधार पर सरकारी नौकरी से हमेशा के लिए वंचित भी नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी कहा कि आधुनिक न्याय व्यवस्था और नियोक्ता की सोच दंडात्मक न होकर पूरी तरह से सुधारात्मक होनी चाहिए।
क्या था पूरा मामला और कैसे छिनी नौकरी
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी की एकलपीठ ने गोपालगंज जिले के मांझागढ़ थाना क्षेत्र स्थित छितौली गांव निवासी राहुल कुमार (पिता शेषनाथ प्रसाद) की ओर से दायर एक अहम रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ता ने केंद्रीय चयन पर्षद (सिपाही भर्ती) के विज्ञापन संख्या 1/2023 के तहत आवेदन किया था। राहुल ने अगस्त 2024 में लिखित परीक्षा और 16 जनवरी 2025 को शारीरिक दक्षता परीक्षा पास की। 1 जून 2025 को उन्होंने बिहार विशेष सशस्त्र पुलिस-6 (BSAP-6), मुजफ्फरपुर में सिपाही पद पर अपना योगदान दे दिया था। वेरिफिकेशन फॉर्म भरते समय राहुल ने आपराधिक मामलों के सवाल पर ‘नहीं’ लिखा था। लेकिन पुलिस जांच में यह सामने आया कि 2016 में उनके खिलाफ मांझागढ़ थाने में एक एफआईआर (कांड संख्या 24/2016) दर्ज थी, जिसमें विभिन्न धाराओं के तहत 75 नामजद और 10 अज्ञात समेत 150 से अधिक लोग आरोपी थे। जानकारी छिपाने के कारण कमांडेंट ने 1 अगस्त 2025 को उनकी नियुक्ति रद्द कर दी थी।
किशोर न्याय बोर्ड ने दी थी पेड़ लगाने की सजा
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता अखिलेश दत्ता वर्मा ने कोर्ट को बताया कि 2016 में जब यह मामला हुआ, तब राहुल नाबालिग थे। उनका मामला गोपालगंज के किशोर न्याय बोर्ड में चला था। बोर्ड ने 17 अक्टूबर 2025 को मामले का निपटारा करते हुए राहुल को छितौली के अपग्रेडेड मिडिल स्कूल परिसर में 40 पेड़ लगाने और एक माह तक उनकी देखभाल करने का निर्देश दिया था। बोर्ड रिपोर्ट में स्पष्ट था कि युवक का परिवार काफी शिक्षित व अनुशासित है और उसकी कोई आपराधिक छवि नहीं है।
‘ला मिजरेबल’ और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का जिक्र
राज्य की ओर से अधिवक्ता ब्रजभूषण मिश्रा व सीएसबीसी की ओर से संजय पांडे आदि उपस्थित रहे। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ‘अवतार सिंह बनाम भारत संघ’ और ‘रविंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश’ के फैसलों का विशेष हवाला दिया कि नियोक्ता को मनमाने ढंग से नहीं, बल्कि वस्तुनिष्ठ तरीके से फैसला करना चाहिए। कोर्ट ने विक्टर ह्यूगो के प्रसिद्ध उपन्यास ‘ला मिजरेबल’ के पात्र जीन वलजीन का भी उदाहरण दिया, जिसे परिवार के लिए रोटी चुराने पर जीवन भर चोर कहा गया। अदालत ने लॉर्ड डेनिंग के फैसले का भी जिक्र किया कि युवावस्था में अक्सर नादानियां हो जाती हैं। कोर्ट ने कहा कि संभवतः नौकरी न मिलने के डर से याचिकाकर्ता ने फॉर्म में जानकारी छिपाई होगी। उस पर हत्या, डकैती या बलात्कार जैसे कोई गंभीर आरोप नहीं थे। हाईकोर्ट ने 1 अगस्त 2025 का बर्खास्तगी आदेश तत्काल रद्द करते हुए रिट याचिका स्वीकार कर ली। साथ ही राज्य सरकार को निर्देश दिया कि इन टिप्पणियों को ध्यान में रखकर चार महीने के भीतर नया आदेश पारित करे। यह निर्णय पुलिस वेरिफिकेशन में छंटने वाले युवाओं के लिए नजीर है।



